रविवार, 01 जुलाई, 2007 को 02:02 GMT तक के समाचार
फ़्रैंक गार्डनर
सुरक्षा और ख़ुफ़िया मामलों के संवाददाता
लंदन और ग्लासगो की घटनाओं को जोड़कर पुलिस इसलिए देख रही है क्योंकि ग्लासगो हवाई अड्डे के भीतर तक जो कार घुसाने की कोशिश की जा रही थी उसमें सिर्फ़ ईंधन ही नहीं रखा था बल्कि उसमें प्रोपेन गैस के चार से पाँच सिलिंडर भी रखे थे.
उसमें विस्फोट की काफ़ी संभावना थी बल्कि हल्का सा विस्फोट हुआ भी.
अगर वे लोग विस्फोट करने में क़ामयाब हो जाते तो कम से कम 100 या कहें कि सैकड़ों लोग तक मारे जा सकते थे. लोग बस बाल-बाल बच गए.
लंदन और ग्लासगो के हमले करने के तरीक़ों में भी संबंध है. भले ही दोनों जगहों के हमलावर एक दूसरे को नहीं जानते हों मगर इसे सिर्फ़ संयोग ही नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये कुछ ज़्यादा ही संयोग की बात हो जाएगी कि दोनों ही हमलों की कोशिश लगभग एक जैसी थी.
लंदन और ग्लासगो के हमलों में अंतर सिर्फ़ इतना था कि ग्लासगो के हमले में कीलें नहीं रखी गईं थीं. मगर बाक़ी सब तो एक ही जैसा था.
ये गैस और पेट्रोल को मिलाकर विस्फोटक बनाने की कोशिश थी, जिससे ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान होता.
अल-क़ायदा से संबंध
वैसे हमलों का समय भी महत्त्व रखता है. कुछ ही दिनों के भीतर एक जैसे हमलों की कोशिश और ये लगता है कि समन्वय बैठाकर हमला करने की कोशिश हुई है.
ये अल-क़ायदा का एक विशेष तरीक़ा है और इससे लोगों में इस बात का शक़ बढ़ेगा कि इन लोगों का पाकिस्तान में बैठे अल-क़ायदा के मुख्य नेतृत्त्व के साथ समन्वय था.
ब्रिटेन के ख़ुफ़िया विभाग के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि हर जगह नज़र रखी जा सके क्योंकि किसी पर नज़र रखने के लिए काफ़ी लोगों की ज़रूरत होती है.
अब ये स्पष्ट है कि ये ब्रिटेन को लगातार निशाना बनाने की रणनीति का हिस्सा है मगर ये कहना मुश्किल है कि ये कब तक चलेगा.