गुरुवार, 21 जून, 2007 को 13:04 GMT तक के समाचार
मैथ्यू वेल्स
बीबीसी संवाददाता, हवाई, अमरीका
अमरीकी नौसेना के लेफ़्टिनेंट कमांडर अबूहेना सैफ़ुल इस्लाम हर किसी का स्वागत एक बड़ी मुस्कान के साथ करते हैं और वह ख़ुद को चैपलिन सैफ़ कहलाना पसंद करते हैं.
सैफ़ुल इस्लाम अमरीकी मरीन कोर में अकेले मुस्लिम चैपलिन हैं और पूरी अमरीकी नौसेना में उनके अलावा सिर्फ़ एक और मुस्लिम चैपलिन है.
अमरीकी मरीन बनने तक की सैफ़ुल इस्लाम की दास्ताँ काफ़ी दिलचस्प है, दरअसल बांग्लादेश से अमरीका आकर बसने का उनका सफ़र काफ़ी रोमांचक रहा है. वह बांग्लादेश से 1980 के दशक में अमरीका आए थे और उन्होंने बिज़नेस में मास्टर्स की डिग्री हासिल की हुई थी.
जब वह अमरीका पहुँचे थे तो उनकी मंशा सिर्फ़ वॉल स्ट्रीट इलाक़े में काम करने यानी कोई अच्छी सी नौकरी करने की थी. एक युवक के रूप में सैफ़ुल इस्लाम उन फ़िल्मों से काफ़ी प्रभावित रहे जो दूसरे विश्व युद्ध की कहानियों पर आधारित होती थीं और उनमें अमरीकी नौसैनिक सफ़ेद वर्दी में एक्शन में नज़र आते थे. वर्दी का रौबदाब उन्हें काफ़ी प्रभावित करता था.
वाशिंगटन से कुछ ही दूरी पर स्थित अपने घर में बैठे हुए सैफ़ुल इस्लाम कहते हैं, "जब मेरे परिवार को यह पता चला कि अमरीकी नौसेना मुझे नौकरी देने के लिए तैयार है तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा."
विविध समूह
अमरीका की सशस्त्र सेनाओं में 100 से ज़्यादा अस्थाओं के लोग नौकरी करते हैं लेकिन कोई भी आस्था समूह उतना संवेदनशील नहीं है जितना कि पेंटागन और इस्लाम का संबंध संवेदनशील है.
चैपलिन सैफ़ अमरीकी सेना का एक अलग चेहरा बन चुके हैं, उनके इंटरव्यू के लिए उनके पीछे भारी भीड़ रहती है और उनका कहना है कि वह इस्लाम और अमरीकी सेना की एक साथ सेवा करने में कोई टकराव नहीं देखते हैं.
लेकिन सैफ़ुल इस्लाम की प्रतिबद्धता सिर्फ़ जनसंपर्क मामलों तक ही नहीं है बल्कि उसमें कहीं ज़्यादा गहराई नज़र आती है.
सैफ़ुल इस्लाम अमरीकी मरीन कोर के क्वांटिको अड्डे पर पहुँचे थे और तब तक वहाँ मुस्लमानों के लिए कोई प्रार्थना स्थल नहीं था. मुसलमान सैनिक कार के पास या किसी इमारत की बगल में, जहाँ भी जगह मिल जाती थी, वहीं नमाज़ अदा कर लिया करते थे. अब इस मरीन अड्डे पर बाक़ायदा एक मुस्लिम प्रार्थना स्थल है जहाँ हर शुक्रवार को वे इकट्ठा होकर नमाज़ अदा करते हैं.
यह काफ़ी विविधता वाला समूह है जिसमें मोरक्को वायु सेना का एक अधिकारी भी है, कुछ महिलाएँ सैनिक भी हैं जो नमाज़ के लिए अपनी सैन्य वर्दी बदलकर टख़नों तक का चोग़ा पहनती हैं. उनमें से एक मिलिटरी पुलिस अधिकारी का कहना था कि वह इराक़ या अफ़ग़ानिस्तान में सेवा करने की इच्छा रखती हैं.
वह पुलिस अधिकारी कहती हैं, "सबसे डरावनी बात ये है कि वहाँ जो चरमपंथी हैं वे हमारे बारे में वहाँ ग़लत छवि पैदा करते हैं, वे एक ऐसा भेद पैदा करते हैं जो वास्तव में है ही नहीं."
एक अन्य सैनिक का कहना है कि इस्लाम और अमरीकी मरीन के एक जैसे ही मूल्य हैं. इस सैनिक ने हाल ही में मध्य पूर्व क्षेत्र का दौरा किया है. यह सैनिक कहता है, "सम्मान, साहस और प्रतिबद्धता, ये तीन मूल्य हैं जो इस्लाम हमें सिखाता है. हमारे बीच जो गाढ़े संबंध हैं वो एक मुस्लिम और भाई होने के नाते हैं."
चैपलिन सैफ़ुल इस्लाम अपना ज़्यादातर समय वर्जीनिया से दूर उन सैनिकों को प्रोत्साहित करने में बिताते हैं जो युद्ध स्थलों की तरफ़ जाने के लिए तैयार होते हैं और ख़ासतौर से ये युद्धस्थल मुस्लिम देशों में हैं.
ज़्यादातर युवा सैनिकों के लिए सैफ़ुल इस्लाम ऐसा पहला मुस्लिम चेहरा हैं जिनसे उनकी मुलाक़ात हुई है, उनसे पहले वे किसी मुस्लिम से मिले ही नहीं हैं.
ग्वांतनामो
सैफ़ुल इस्लाम से मेरी मुलाक़ात हवाई में शोफ़ील्ड बैरकों में एक प्रशिक्षण सत्र के दौरान हुई. वहाँ कई सौ सैनिक एक थियेटर में बैठे हुए थे जिसमें अंधेरा था. वहाँ एक ऐसे धर्म के बारे में कुछ मूलभूत बातें सिखाने की कोशिश हो रही थी जिसके बारे में अमरीका में बहुत से मीडिया संगठन आक्रामक रवैये से पेश आते हैं और यह रवैया दबा-छुपा नहीं रहा है.
यह सत्र कोई सैद्धांतिक नहीं होकर, ज़्यादातर प्रयोग पर आधारित था. चैपलिन अपनी प्रशिक्षण तकनीक में वास्तविक नज़र आते हैं. वह बताते हैं कि शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच जो मतभेद हैं उनका धर्म से कुछ लेना-देना नहीं लेकिन इसे खाई को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता.
सैफ़ुल इस्लाम समझते हैं कि अरब दुनिया के ज़्यादातर लोग अमरीकी सेना और इराक़ पर क़ब्ज़े से नफ़रत करते हैं लेकिन वह चाहते हैं कि सभी पक्ष इस बात को अच्छी तरह से समझने की कोशिश करें --
"पूरे मज़हब को सिर्फ़ एक नज़र से देखने या इसके बारे में कोई राय बनाने की कोशिश मत कीजिए. अरब लोगों को भी सभी मामलों के बारे में कोई आम राय नहीं बनानी चाहिए... बहुत से ऐसे भी अमरीकी हैं जो हमारी उन कार्रवाइयों को सही नहीं ठहराते जो हम देश के बाहर करते हैं, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि हम अपने देश से प्रेम नहीं करते."
सैफ़ुल इस्लाम की कूटनीतिक क्षमताओं के सबसे बड़े इम्तेहान का समय तब आया जब उन्हें क्यूबा के ग्वांतनामो बे शिविर में अमरीकी जेल में दाख़िल होने का मौक़ा मिला क्योंकि वहाँ दाख़िल होने वाले वह पहले मुस्लिम चैपलिन हैं.
ग्वांतनामो बे शिविर में तीन महीने के अपने समय के दौरान चैपलिन सैफ़ ने वहाँ अज़ान की शुरूआत की और बंदियों के साथ बेहतर बर्ताव को बढ़ावा दिया.
इसमें कभी कोई शक नहीं रहा कि वह वहाँ अपने वरिष्ठ कमांडरों के आदेशों का पालन करने के लिए गए थे, "हम सबमें इस बात पर सहमति थी कि मुझे अपनी सैन्य वर्दी ही पहननी चाहिए क्योंकि दरअसल मैं एक सैनिक ही हूँ. कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने मुझे स्वीकार नहीं किया, उनका कहना था कि मैं एक शैतान हूँ, और कुछ तो मुझे एक ग़द्दार मानते थे."
चैपलिन सैफ़ मानते हैं कि ग्वांतनामो बे शिविर एक उद्देश्य के लिए बनाया गया जिसमें यह कामयाब रहा है लेकिन कूटनीतिक रूप से वह यह भी इशारा करते हैं कि ख़ुद राष्ट्रपति जॉर्ज बुश भी कह चुके हैं कि वह इस बंदीगृह को बंद कराने के इच्छुक हैं.