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बुधवार, 06 जून, 2007 को 07:02 GMT तक के समाचार

जी-8: जलवायु परिवर्तन का मुद्दा रहेगा गर्म

दुनिया के प्रमुख औद्योगिक देश जर्मनी में तीन दिवसीय जी-8 सम्मेलन के दौरान परमाणु हथियारों और जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मसलों पर चर्चा करेंगे.

यह सम्मेलन छह से आठ जून तक जर्मनी के बाल्टिक रिसोर्ट में होगा.

सम्मेलन ऐसे वक्त हो रहा है, जब रूस परमाणु हथियारों और अमरीका जलवायु परिवर्तन के मसलों पर दुनिया के अन्य देशों के निशाने पर है.

जी-8 क्या है

जी-8 दुनिया के सबसे अमीर देशों का अनौपचारिक संगठन है. ये आठ देश हर साल आम आदमी से जुड़े मसलों पर चर्चा के लिए बैठक करते हैं.

इसके सदस्यों में अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, जापान, इटली और कनाडा हैं, जबकि रूस को 1998 में आठवें सदस्य के रूप में संगठन में शामिल किया गया.

1975 में तेल संकट ने जब दुनिया की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया तब इसकी पहली बैठक हुई थी. लेकिन बाद के वर्षों में इसके एजेंडे में परमाणु अप्रसार और आतंकवाद जैसे राजनीतिक मसले भी शामिल होने लगे.

जी-8 की अध्यक्षता हर वर्ष बारी-बारी से इसके सदस्य देशों के हिस्से आती है. रूस ने 2006 के सम्मेलन की मेजबानी सेंट पीटर्सबर्ग में की थी, जबकि अगले वर्ष इसकी मेजबानी जापान करेगा.

सम्मेलन में कौन-कौन

इस वर्ष के जी-8 सम्मेलन की मेजबानी जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल कर रही हैं.

27 जून को अपने पद से हट रहे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर का यह आख़िरी सम्मेलन होगा. जबकि फ़्रांस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी पहली बार इस बैठक में शिरकत करेंगे.

सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश, रुसी राष्ट्रपति पुतिन, इटली के राष्ट्रपति रोमानो प्रोदी, जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो एबी, कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफ़न हार्पर और यूरोपीय संघ के अध्यक्ष जोस मैन्युएल बरोसो भाग लेंगे.

इनके अलावा भारत समेत कई प्रमुख विकासशील देशों और अफ़्रीकी देशों के प्रमुखों को भी बतौर पर्यवेक्षक सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है.

जलवायु परिवर्तन

सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा छाए रहने की उम्मीद है.

जर्मनी और अन्य यूरोपीय देश 2012 में समाप्त होने जा रहे क्योटो समझौते की जगह नई संधि के लिए दबाव डाल रहे हैं.

कहा जा रहा है कि पर्यावरण के लिए नुक़सानदेह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए कड़े कायदे-क़ानून बनें.

जर्मनी ने वर्ष 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 50 फ़ीसदी कमी का प्रस्ताव किया है, इसके अलावा वह वर्ष 2020 तक ऊर्जा में 20 फ़ीसदी सुधार चाहता है.

यूरोपीय संघ भी सैद्धांतिक तौर पर इस प्रस्ताव पर राजी है.

अमरीका ने क्योटो समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे और वह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी के अनिवार्य लक्ष्यों का खुलेआम विरोध करता है.

यूरोप में परमाणु हथियार

अमरीका की मिसाइल रक्षा प्रणाली को पूर्वी यूरोप में स्थापित करने की मंशा पर भी सम्मेलन में बहस होने की संभावना है.

अमरीका का कहना है कि वह ईरान और उत्तर कोरिया के संभावित हमलों से सुरक्षा के लिए पोलैंड और चेक गणराज्य में मिसाइल विरोधी रक्षा कवच लगाना चाहता है, जबकि रूस इसका विरोध कर रहा है.

रूस ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया है और कहा है कि इससे हथियारों की होड़ बढ़ेगी.

अफ़्रीका में ग़रीबी

दो साल पहले स्कॉटलैंड के ग्लेनग्लेस में जी-8 सम्मेलन में अमीर राष्ट्रों ने अफ़्रीका में ग़रीबी से निपटने के लिए सहायता राशि दोगुनी करने का वादा किया था.

लेकिन अभी तक इन वादों पर अमल नहीं किया गया है.

हालाँकि कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से अफ़्रीकी अर्थव्यवस्था में उम्मीद से अधिक उछाल आया है.

जर्मनी चाहता है कि जी-8 अफ़्रीका में निजी निवेश को बढ़ावा दे और एचआईवी एड्स से मुक़ाबले के लिए अधिक राशि खर्च करे.

क्षेत्रीय सुरक्षा

सम्मेलन में प्रमुख क्षेत्रीय मसलों पर रूस के अन्य जी-8 सदस्यों से टकराव की भी आशंका है.

कोसोवो मसले पर रूस ने इसे सर्बिया से स्वतंत्रता देने के प्रस्ताव का विरोध किया है.

कई वर्षों से कोसोवो की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र के पास है और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नैटो) के नेतृत्व वाली शांति सेना पर है.

रूस ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने का भी विरोध किया है.

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और पश्चिमी देशों ने परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ने के लिए ईरान की आलोचना की थी और इसके बाद ईरान पर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगा दिए थे.