मंगलवार, 08 मई, 2007 को 22:10 GMT तक के समाचार
पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने घोषणा की है कि उनकी फ़ाउंडेशन ने दो भारतीय दवा कंपनियों से समझौता किया है ताकि एचआईवी या एड्स से पीड़ित लोगों को कम क़ीमत पर दवाएँ उपलब्ध हो सकें.
बिल क्लिंटन ने घोषणा की है कि वे चाहते हैं कि विकासशील देशों में एचआईवी-एड्स दवाओं की कीमत में 25 से 50 फ़ीसदी तक की कमी हो.
क्लिंटन फ़ाउंडेशन ने भारत की दो दवा कंपनियों सिपला और मैट्रिक्स लेबोरेटरीज़ के साथ एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के लिए समझौता किया है.
दूसरी श्रेणी की ये एंटीरेट्रोवायरल दवाएँ तब इस्तेमाल होती हैं जब एचआईवी-एड्स का सस्ती दवाओं से इलाज संभव नहीं होता है.
ये दवाएँ अफ़्रीका, एशिया, लातिनी अमरीका और कैरिबियाई 60 से अधिक देशों में उपलब्ध होंगी.
सस्ती दवाएँ
बिल क्लिंटन ने कहा कि इन देशों में सात करोड़ लोगों को एचआईवी-एड्स के इलाज की आवश्कता है लेकिन महंगी दवाओं के कारण लोग इलाज नहीं करा पाते हैं.
उनका कहना था,'' कोई कंपनी एड्स की दवाओं में कमी से ख़त्म नहीं होगी लेकिन इससे पीड़ित रोगी की मौत हो सकती है.''
साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वो बौद्धिक संपदा में विश्वास रखते हैं और चाहते हैं कि दवा निर्माता अपनी दवा की खोज की लागत और लाभ निकालें.
क्लिंटन फ़ाउंडेशन यूनिटेड नामक संगठन के सहयोग से काम कर रहा है जिसे फ्रांस, ब्राज़ील, चिली, नॉर्वे और ब्रिटेन जैसे देशों ने स्थापित किया है और वह इस कार्यक्रम को वित्तीय सहयोग प्रदान कर रहा है.
उल्लेखनीय है कि भारत एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए सस्ती जेनेरिक दवाएँ बनाता है जो कई देशों में निर्यात भी की जाती हैं.
लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बौद्धिक संपदा क़ानूनों के तहत जेनरिक दवाए बनाए जाने का विरोध करती हैं.
ग़ौरतलब है कि दुनिया भर में लगभग चार करोड़ 20 लाख लोग एचआईवी का शिकार हैं.
उनमें से दो तिहाई तो अफ़्रीकी देशों में रहते हैं और जिन देशों में इसका संक्रमण सबसे ज़्यादा है वहाँ हर तीन में से एक वयस्क इसका शिकार है.