सोमवार, 05 मार्च, 2007 को 01:44 GMT तक के समाचार
ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित रिसर्च समूह की रिपोर्ट के अनुसार ईरान पर हमला करना ऐसी परिस्थितियों को जन्म देगा जिससे ईरान और तेज़ी से परमाणु हथियार बना सकेगा.
ब्रिटेन और अमरीकी नीतियों की आम तौर पर आलोचना करने वाले ऑक्सफोर्ड रिसर्च समूह की यह रिपोर्ट जाने माने परमाणु वैज्ञानिक फ्रैंक बार्नबी ने लिखी है.
‘क्या हवाई हमले कारगर होंगे’ नामक इस रिपोर्ट के अनुसार ईरान पर ऐसे हमले उसके परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम नहीं हैं बल्कि ऐसे हमलों से ईरान और तेज़ी से परमाणु हथियार बना सकता है.
ऑक्सफोर्ड रिसर्च समूह की रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब खाड़ी क्षेत्र में अमरीकी नौसेना के दो विमानवाहक लड़ाकू पोत तैनात हो चुके हैं और अमरीकी प्रवक्ता ने कहा है कि ईरान के ख़िलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावना को खारिज़ नहीं किया जा सकता.
इस समूह की रिपोर्ट भी वही बात कहती है जो पिछले कुछ समय से वायु हमलों के जानकार कहते रहे हैं.
रिपोर्ट के अनुसार ईरान के परमाणु ठिकानों को ध्वस्त करना उतना आसान नहीं है जितना अमरीका समझता है. इसके लिए एक साथ कई लक्ष्यों को निशाना बनाना होगा और उसके बाद भी यह कहना मुश्किल होगा कि परिणाम आशानुरुप होंगे. संभावना इसकी भी है कि ईरान में ऐसे ठिकाने हों जिनके बारे में अमरीकी गुप्तचर सेवाओं को जानकारी न हो.
यह रिपोर्ट किसी सैनिक विशेषज्ञ ने नहीं लिखी है बल्कि जाने माने परमाणु वैज्ञानिक और शांति के पैरोकार फ्रैंक बार्नबी ने तैयार की है जिसमें मूल रुप से ईरान पर संभावित अमरीकी हमले के बाद की स्थिति को दर्शाया गया है.
रिपोर्ट अमरीकी कार्रवाई की नैतिकता पर सवाल उठाते हुए कहता है कि वरसों पहले अमरीकी नीतियों के तहत ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम शुरु हुआ था.
रिपोर्ट के अनुसार अगर अमरीका ने हमला किया तो ईरान वर्षों की बजाय महीनों में परमाणु हथियार तैयार कर सकता है हालांकि यह साफ नहीं है कि परमाणु हथियारों के लिए ईरान के पास कितना संवर्धित यूरेनियम है.
यूरेनियम की मात्रा इस तथ्य पर आधारित है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने कितनी प्रगति की है.
इस रिपोर्ट की प्रस्तावना लिखते हुए संयुक्त राष्ट्र परमाणु ऊर्जा एजेंसी के पूर्व प्रमुख हांस ब्लिक्स ने लिखी है. रिपोर्ट में पूरा ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि ईरान के वर्तमान परमाणु कार्यक्रम को परमाणु हथियारों तक ले जाने में अभी वर्षों का समय लगना है और अभी भी कूटनीति से काम लिया जा सकता है.