मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007 को 14:07 GMT तक के समाचार
इराक़ में तेल से होने वाली आय को विभिन्न समुदायों में समानुपात के आधार पर बाँटने के लिए मंत्रिमंडल ने एक क़ानून का मसौदा मंज़ूर किया है. इन समुदायों में शिया, सुन्नी और कुर्द भी हैं.
इस प्रस्तावित क़ानून में इराक़ के 18 प्रांतों को उनकी जनसंख्या के आधार पर तेल की आय का आबंटन किया जाएगा. इसे क़ानून बनाने लिए संसद की मंज़ूरी ज़रूरी होगी.
प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ने इस प्रस्तावित क़ानून को "इराक़ी लोगों के लिए एक तोहफ़ा" क़रार देते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय हितों के आधार पर बनाया जा रहा है.
मलिकी ने एक पत्रकार सम्मेलन में कहा, "यह क़ानून इराक़ी लोगों के सभी धड़ों को एकजुट करेगा."
ख़बरों के अनुसार इस मसौदे में यह भी शामिल किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ इराक़ के तेल उद्योग में किस तरह से और कितना निवेश कर सकेंगी.
विदेशी कंपनियाँ पिछले चार साल के दौरान इराक़ में अस्थिरता की वजह से तेल उद्योग में निवेश नहीं कर रही हैं.
अमरीका ने इस मसौदे पर सहमति बनने का स्वागत करते हुए इसे इराक़ी लोगों के लिए अच्छा क़दम बताया है.
संयुक्त राष्ट्र में इराक़ के राजदूत फ़ैसल इस्त्राबादी ने इस प्रस्तावित क़ानून के बारे में कहा, "इस क़ानून से सभी इराक़ियों के विकास के लिए बराबरी से पैसा मिल सकेगा. हम ये नहीं देख रहे हैं कि तेल कंपनियाँ कहाँ से आ रही हैं – पूरब से पश्चिम से या उत्तर या दक्षिण से. हम ये देख रहे हैं कि कौन सी कंपनियाँ सबसे कार्यकुशल हैं ताकि इराक़ का विकास हो सके."
क्षेत्रीय मतभेद
ग़ौरतलब है कि इराक़ में तेल की आय के बँटवारे को लेकर तीन प्रमुख समुदायों - शिया, सुन्नी और कुर्दों के बीच काफ़ी तनाव चल रहा है. इराक़ के पास दुनिया में तीसरे सबसे ज़्यादा तेल भंडार हैं और ये भंडार 115 अरब बैरल तक की क्षमता के हो सकते हैं.
दुनिया में सबसे ज़्यादा तेल भंडार सऊदी अरब और ईरान के पास हैं और इराक़ का तीसरा नंबर है लेकिन मार्च 2003 में अमरीकी नेतृत्व वाले विदेशी गठबंधन के हमले के बाद से इराक़ में तेल उत्पादन काफ़ी कम हो गया है. पहले यह औसतन 35 लाख बैरल प्रतिदिन होता था लेकिन अब औसतन बीस लाख बैरल प्रतिदिन पर आ गया है.
देश में तेल के भंडारों में से ज़्यादातर दक्षिणी इलाक़ों में जहाँ शियाओं का दबदबा है जबकि भविष्य में तेल की संभावनाओं वाले क्षेत्र उत्तरी इलाक़ों में हैं जहाँ कुर्द ज़्यादा संख्या में हैं.
बीसवीं सदी में इराक़ में राजनीतिक ताक़त और तेल भंडारों का नियंत्रण मुख्य रूप से सुन्नी अरब शासकों के पास रहा और इराक़ में सुन्नी ख़ासतौर से केंद्रीय इलाक़ों में ज़्यादा संख्या में हैं.
सत्ता से हटाए गए सुन्नी समुदाय और सत्ता में आए नए राजनीतिक समुदायों - शिया और कुर्दों के बीच राजनीतिक मतभेदों की वजह दुश्मनी का माहौल नज़र आता है और जातीय हिंसा ने हज़ारों लोगों की जान ले ली है.
विश्वेषकों का कहना है कि उम्मीद की जा रही है कि यह तेल क़ानून देश में एकता स्थापित करेगा जिसकी बहुत ज़रूरत है. बहुत से जानकारों का कहना है कि इराक़ में हिंसा इस हद तक बढ़ चुकी है कि वह गृहयुद्ध के कगार पर नज़र आता है.
सरकार ने इस क़ानून को लागू करने की जो समय सीमा तय की थी, उसके क़रीब दो महीने बाद अब यानी मंगलवार, 27 फ़रवरी 2007 को इसे मंत्रिमंडल की मंज़ूरी मिली है.
गत सप्ताहांत इस प्रस्तावित क़ानून को कुर्द सांसदों ने अपना समर्थन दे दिया था जिसके बाद मंत्रिमंडल ने इस मंज़ूर कर दिया. कुर्दों की माँग थी कि उन्हें कुर्द बहुल इलाक़ों में तेल उत्पादन के मामले में स्वायत्तता दी जाए.