सोमवार, 01 जनवरी, 2007 को 18:02 GMT तक के समाचार
इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फाँसी देने के ख़िलाफ़ सोमवार को इराक़ में कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए. सुन्नी बहुल तिकरित और समारा में सैकड़ों प्रदर्शनकारी जमा हुए.
तिकरित सद्दाम हुसैन का गृह नगर है. प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए और बदला लेने की बात कही. उन्होंने सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने को आपराधिक कृत्य कहा.
जॉर्डन में भी सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुआ जिसमें सद्दाम हुसैन की बेटी रग़ाद भी शामिल हुईं.
सद्दाम हुसैन के सैकड़ों समर्थकों ने सोमवार को समारा और तिकरीत में विरोध प्रदर्शन किए.
सुन्नी समुदाय के इन लोगों का कहना था कि सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़ाया जाना एक आपराधिक और कायराना कृत्य था.
लोगों का कहना था कि सब कुछ इराक़ी न्याय प्रक्रिया के नाम पर किया गया, लेकिन इसकी पूरी भूमिका अमरीकी नेताओं ने पहले से तैयार कर रखी थी.
बीबीसी संवाददाता का कहना कि इराक़ में चल रहे ताज़ा घटनाक्रम के लिहाज़ से इस विरोध प्रदर्शन को कोई बहुत बड़ी घटना नहीं कहा जा सकता लेकिन रविवार को सद्दाम हुसैन को फाँसी पर चढ़ाए जाने के बाद शिया समुदाय ने जिस तरह से जश्न मनाया, उसके बाद सुन्नी समुदाय की ओर से उठे विरोध के ये स्वर कम अहमियत नहीं रखते.
सद्दाम हुसैन के समर्थन में लगाये जा रहे नारों में कहा जा रहा था कि सद्दाम देश का गौरव हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे सद्दाम के लिए अपनी आत्मा और जान तक क़ुर्बान कर देंगे.
जॉर्डन में भी प्रदर्शन
उधर जॉर्डन की राजधानी अम्मान में भी सद्दाम हुसैन के समर्थकों ने उनकी बड़ी-बड़ी तस्वीरें उठा कर सड़कों पर विरोध व्यक्त किया. इस विरोध अभियान में सद्दाम हुसैन की बेटी रग़ाद भी शामिल थीं.
इन्हीं विरोध प्रदर्शनों में शामिल जोर्डन के विपक्षी नेता लाइथ शबीलात का कहना था कि सद्दाम हुसैन को अरब जगत के नेता का दर्जा दिया जाना चाहिए.
उन्होने कहा, "अमरीका के सामने न झुकने वाले वो एकमात्र अदभुत नेता थे, उन्होंने इराक़ की समृद्धि को सारे अरब जगत की समृद्धि माना. कई अरब देशो की उन्होंने समय-समय पर सहायता की और उन नेताओं के साथ खड़े हुए जो मुसीबत में थे. बाद में उन्हीं देशों ने सद्दाम हुसैन से ही मुँह फेर लिया. उन्हें अरब जगत के नेता के रूप में याद किया जाना चाहिए."
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इराक़ के प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ये मान रहे हैं कि सद्दाम हुसैन को फाँसी पर चढ़ा दिए जाने के बाद सुन्नी समुदाय के हौसले पस्त हो जाएँगे और वे अपने विरोध को एक तरफ रख राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हो जाएँगे.
लेकिन जिस तरह से इराक़ और उसके बाहर भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं उन्हें देख कर ऐसा नहीं लगता कि ये दरार जल्द भरने वाली है.