शनिवार, 30 दिसंबर, 2006 को 09:08 GMT तक के समाचार
इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने पाँच नवंबर को इराक़ी आवाम के नाम एक चिट्ठी लिखी थी जिसे उनके वकील ने जारी किया. इस चिट्ठी के मुख्य अंश :
''जैसा कि आप सब जानते हैं अतीत में मैं जेहाद और युद्ध के मैदान में व्यस्त था. ख़ुदा की इच्छा है कि मैं उसी जोश के साथ इन सबका फिर से सामना करूँ जैसा हम सबने क्रांति से पहले किया था लेकिन इस बार समस्य ज़्यादा बड़ी और कहीं अधिक कठिन है.
प्रिय देशवासियो, हम और हमारा इराक़ एक कठिन दौर से गुज़र रहा है लेकिन यह लोगों के लिए एक नया अध्याय और नई परीक्षा है.
जब ग़ैर-महत्वपूर्ण लोगों को विदशी ताक़तें सत्ता सौंप देती है तो वो इसका इस्तेमाल अपने ही लोगों के दमन के लिए करते है.
'क़ुर्बानी'
मेरे देशवासियों आप जानते हैं कि इस पत्र का लेखक विश्वासी, ईमानदार और बिना किसी भेदभाव के लोगों की देखभाल करने वाला है.
उसके दिल में ग़रीबों के लिए काफ़ी दर्द है और वह जब तक उनकी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर लेता आराम नहीं करता.
मैं अपनी क़ुर्बानी देकर ख़ुदा को अपनी आत्मा सौंपने जा रहा हूँ अगर वो इसे स्वीकार करेगा तो शहीदों के साथ जन्नत में जगह देगा.
हमें धैर्य से काम लेना चाहिए और अन्याय करने वाले देशों के ख़िलाफ़ ख़ुदा के इंसाफ़ का इंतज़ार करना चाहिए.
हालाँकि क्रांति से पहले और बाद में हमने और हमारे इराक़ ने काफ़ी कठिनाइयाँ झेलीं लेकिन ख़ुदा नहीं चाहता था कि सद्दाम हुसैन मरे.
लेकिन अगर इस बार वो ऐसा ही चाहता है तो ये उसकी रचना है और उसी ने अब तक इसकी रक्षा की है.
अगर ख़ुदा की इच्छा है कि मैं शहीद हो जाऊँ तो इसके लिए मैं उसका शुक्रिया अदा करता हूँ.
'दुश्मन'
हमारे मुल्क के दुश्मनों, हमलावरों और ईरानियों को लगा कि आपकी एकता की वजह से वे आपको ग़ुलाम नहीं बना पाएँगे तो उन्होंने आपके बीच नफ़रत के बीज बो दिए.
इराक़ या उसकी सीमा के बाहर अगर कोई भी व्यक्ति पश्चताप करे तो आप लोग उसे माफ़ कर दीजिएगा.
आपको जानना चाहिए कि हमला करने वालों के बीच से ही कुछ लोगों ने इस आक्रमण के ख़िलाफ़ संघर्ष में हमारी मदद की है. उनमें से कुछ ने मेरी और दूसरे क़ैदियों की क़ानूनी मदद की है.
इनमें से कुछ लोगों ने जब मुझे अलविदा कहा तो रो पड़े. मेरे वतन के प्यारे लोगों अब मैं आपको अलविदा कहता हूँ.
इराक़ ज़िंदाबाद, इराक़ ज़िंदाबाद, ... फ़लस्तीन ज़िंदाबाद... जिहाद ज़िंदाबाद और मुजाहिदीन ज़िंदाबाद.
(हस्ताक्षर) सद्दाम हुसैन, राष्ट्रपति और इराक़ी मुजाहिद सेना का कमांडर इन चीफ
अतिरिक्त नोट
पूर्व इराक़ी राष्ट्रपति ने इस पत्र के साथ ये अतिरिक्त नोट लिखा:
"मैंने यह चिट्ठी इसलिए लिखी क्योंकि मुझे वकीलों ने बताया था कि हमलावरों की ओर से बनाए गए कथित आपराधिक अदालत की ओर से मुझे अंतिम बयान देने का मौक़ा मिलेगा.
लेकिन अदालत और उसके मुख्य जज ने हमें एक भी शब्द कहने का मौक़ा नहीं दिया और बिना किसी स्पष्टीकरण के वो सज़ा सुना दी जिसका आदेश उसे हमलावरों ने दिया था.
इसके लिए कोई सुबूत भी पेश नहीं किया. मैं चाहता था कि लोग इसे जानें.