शनिवार, 30 दिसंबर, 2006 को 03:58 GMT तक के समाचार
इराक़ी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ने कहा है कि सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने के साथ ही उनके देश के इतिहास का एक काला अध्याय ख़त्म हो गया.
इस बीच सद्दाम हुसैन के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए उनके गृह शहर तिकरित लाया गया है.
ख़बरों के मुताबिक सद्दाम के शव को उनके गाँव अवजा में रह रहे रिश्तेदारों को सौंपा गया है.
पहले ये संभावना जताई गई थी कि उन्हें अवजा में ही दफ़नाया जाएगा. बाद में सद्दाम के परिजनों ने बताया कि पूर्व राष्ट्रपति ने अवजा या रमादी में दफ़नाए जाने की इच्छा जताई थी, लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें रमादी में दफ़नाने की तैयारी हो रही है.
मलिकी का बयान
मलिकी ने सरकारी टेलीविज़न पर पढ़े गए बयान में कहा है कि 'सद्दाम का वही हश्र हुआ जो सभी तानाशाहों का हुआ है.'
उन्होंने कहा कि लंबे अरसे से तानाशाही का दंश झेल चुका इराक़ अब उस दौर से उबर गया है.
इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को उत्तरी बग़दाद में फाँसी दी गई है. इराक़ी टीवी के अनुसार सद्दाम को स्थानीय समयानुसार सुबह छह बजे से ठीक पहले फाँसी दी गई.
दो दशकों तक इराक़ पर शासन करने वाले सद्दाम हुसैन को इराक़ की एक अदालत ने पिछले महीने मानवता के ख़िलाफ़ अपराध करने का दोषी पाया था.
इराक़ के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मौफ़ाज़ अल-रूबेई और कुछ इराक़ी नागरिक सद्दाम को फाँसी दिए जाने के प्रत्यक्षदर्शी थे. इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो फ़िल्म बनाई गई है.
उनका कहना था कि हथकड़ियों में सद्दाम को चुपचाप फाँसी के तख़्ते तक ले जाया गया. उनका कहना था कि सद्दाम के हाथ में पवित्र क़ुरान थी और वे काफ़ी हताश नज़र आ रहे थे.
सद्दाम की फाँसी देने की प्रक्रिया के कुछ अंश बाद में इराक़ी टीवी पर दिखाए गए. हालांकि इसमें फाँसी पर लटकाने के अंशों को शामिल नहीं किया गया है.
फाँसी के बाद सद्दाम हुसैन का पार्थिव शरीर भी इराक़ी टीवी की ओर से दिखाया गया है.
फाँसी की प्रक्रिया
सद्दाम जब फाँसी के तख़्ते तक आए तो वो क़ैदियों की पोशाक में नहीं थे बल्कि उन्होंने सफेद कमीज़ के साथ एक गहरे रंग का ओवरकोट पहन रखा था.
सद्दाम हुसैन ने फाँसी दिए जाते समय किसी तरह का विरोध नहीं किया लेकिन काला नक़ाब पहनने से इनकार कर दिया.
हालांकि उन्हें फाँसी के तख़ते तक लाने वाले और फाँसी लगाने वाले लोग नकाबों से अपना चेहरा ढके हुए थे.
फाँसी देते वक़्त एक कपड़ा उनकी गर्दन में लपेट दिया गया था. फाँसी देने की प्रक्रिया को कुछ ही मिनटों में पूरा कर लिया गया था.
सुरक्षा और हिंसा
इराक़ में अमरीकी सैनिक और इराक़ी सुरक्षाकर्मी पूरी सतर्कता बरत रहे हैं ताकि हिंसक प्रतिक्रिया हो, तो स्थिति पर नियंत्रण किया जा सके.
इराक़ में अभी भी कई जगह तनाव है और हिंसा की आशंका भी व्यक्त की जा रही है.
सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने के कुछ ही घंटे बाद दक्षिणी शहर कुफ़ा में बम धमाका हुआ है जिसमें 31 लोग मारे गए हैं और क़रीब 58 लोग घायल हो गए हैं.
दक्षिणी कुफ़ा शहर में बम धमाका भीड़-भाड़ वाले बाज़ार में हुआ. कुफ़ा शिया मुसलमानों का एक तीर्थ स्थल है.
इससे पहले ही अमरीकी विदेश मंत्रालय ने अपने सभी दूतावासों को सतर्क रहने की चेतावनी दे दी थी.
बग़दाद में शिया बहुल इलाक़ों में कई जगह ख़ुशायाँ मनाई गई हैं और लोगों ने हवा में गोलियाँ चलाई गई.
प्रतिक्रिया
जैसे ही सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने की ख़बरें आई, इराक़ में कुछ जगहों पर शिया समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी खुशी का इज़हार किया.
हालांकि दुनियाभर में सद्दाम को फाँसी दिए जाने पर मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. दुनिया के कई देशों ने फाँसी दिए जाने की बात से अपनी असहमति व्यक्त की और इसे ग़लत ठहराया.
कई देशों की ओर से कहा गया है कि फाँसी देने की बात को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है चाहे वह किसी भी व्यक्ति के लिए हो.
दुनियाभर में कुछ लोगों ने सद्दाम को सज़ा सुनाने के लिए चलाई गई न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं.
दुजैल नरसंहार मामला
सद्दाम हुसैन को वर्ष 1982 में इराक़ में हुए दुजैल जनसंहार मामले में दोषी पाया गया था और पिछले साल नवंबर में उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी.
वर्ष 1982 में सद्दाम हुसैन पर जानलेवा हमले की कोशिश के बाद दुजैल में 148 शियाओं को मार दिया गया था.
सद्दाम हुसैन और उनके सहयोगियों को इसी मामले में दोषी पाया गया था और इसी महीने इराक़ की एक अपील अदालत ने उनकी अपील ख़ारिज कर दी थी.
उन्हें फाँसी दिए जाने से एक दिन पहले सद्दाम के वकील ने वाशिंगटन में एक अदालत से अपील की थी कि सद्दाम को इराक़ी अधिकारियों के हवाले न करने के निर्देश दिए जाएँ. लेकिन अमरीकी अदालत ने इस अपील को ख़ारिज कर दिया.
दो दशक रहे शासक
सद्दाम हुसैन दो दशक से ज़्यादा समय तक इराक़ के शासक रहे.
सद्दाम हुसैन का जन्म वर्ष 1937 के अप्रैल महीने में बग़दाद के उत्तर में स्थित तिकरित के एक गाँव में हुआ था.
वर्ष 1957 में युवा हुसैन ने बाथ पार्टी की सदस्यता ली जो अरब राष्ट्रवाद के एक समाजवादी रूप का अभियान चला रही थी.
वर्ष 1962 में इराक़ में विद्रोह हुआ और ब्रिगेडियर अब्दुल करीम क़ासिम ने ब्रिटेन के समर्थन से चल रही राजशाही को हटाकर सत्ता अपने क़ब्ज़े में कर ली. सद्दाम भी इस विद्रोह में शामिल थे.
1968 में फिर विद्रोह हुआ और इस बार 31 वर्षीय सद्दाम हुसैन ने जेनरल अहमद हसन अल बक्र के साथ मिलकर सत्ता पर क़ब्ज़ा किया.
1979 में सद्दाम हुसैन ने ख़राब स्वास्थ्य के नाम पर जनरल बक्र को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया और ख़ुद देश के राष्ट्रपति बन बैठे.
उन्होंने वर्ष 1980 में नई इस्लामिक क्रांति के प्रभावों को कमज़ोर करने के लिए पश्चिमी ईरान की सीमाओं में अपनी सेनाएँ उतार दीं.
इसके बाद आठ वर्षों तक चले युद्ध में लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.
वर्ष 2003 में इराक़ अमरीका और ब्रिटन ने इराक़ पर सामूहिक विनाश के हथियार होने का आरोप लगाया लेकिन इराक़ ने इसका खंडन किया.
जब संयुक्त राष्ट्र में इस मसले पर आम राय नहीं बन पाई तो अमरीका और ब्रिटेन के नेतृत्व वाली सेनाओं ने इराक़ पर हमला किया और अप्रैल 2003 में सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया.