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शनिवार, 30 दिसंबर, 2006 को 15:47 GMT तक के समाचार

जेरमी बावेन
बीबसी के मध्यपूर्व संपादक

इराक़: अब सद्दाम के बाद क्या?

सद्दाम हुसैन को फाँसी की सज़ा सुनाए जाने से बहुत पहले ही वह एक ऐतिहासिक तथ्य बन गए थे. और उसी समय वह इराक़ के भविष्य के बजाए वहाँ के लिए बीते दिनों की बात हो गए थे.

जो लोग यह समझते थे कि सद्दाम ने इराक़ में तबाही लाई थी उन्हें इस बारे में पक्का विश्वास था.

ठीक ऐसा ही विश्वास उन लोगों को भी था जो यह मानते थे कि उनके शासन के दिनों में इराक़ में शांति थी और वहाँ की सड़कें सुरक्षित थीं.

आज की तारीख़ में इराक़ भयानक युद्ध की चपेट में है. इस समय लोगों के लिए सद्दाम को फाँसी दिए जाने पर चिंता करने से ज़्यादा गंभीर चीजें भी हैं जिसके लिए वे परेशान हैं.

आज हालात यह हैं कि आम इराक़ी जनता जो सद्दाम के शासनकाल में कई समस्याओं से घिरा था वह आज भी वैसी ही समस्याओं का शिकार है.

इस समय सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अमरीका, जो इराक़ की मौजूदा स्थिति के लिए ज़िम्मेदार है, अब वहाँ क्या करने जा रहा है.

क्या अब अमरीका के पास इतनी क्षमता है कि वह वहाँ के हालात को सुधार सके? या फिर यह कि उसके कारण वहाँ की स्थिति और भी दयनीय बन जाए? दोनों सवालों में से पहले का जवाब है- ‘शायद’ और दूसरे का जवाब है ‘निश्चित तौर पर’.

अमरीका की इराक़ में स्थिति के बारे में एक बात स्पष्ट है कि उसकी हालत वहाँ अच्छी नहीं है.

यहाँ तक की राष्ट्रपति बुश भी कह चुके हैं की इराक़ में उनका देश न तो जीत रहा है और न ही हार रहा है.

ऐसा लगता है कि विदेश नीति के बारे में आई ताज़ा रिपोर्ट से उन्होंने कोई सबक़ नहीं लिया. यह रिपोर्ट पूर्व विदेश मंत्री जेम्स बेकर और डेमोक्रेटिक कांग्रेस के ली हिल्टन ने पेश की थी.

इस रिपोर्ट में जो बातें कहीं गई थी वह जार्ज बुश की इराक़ के संबंध में कही गई बातों से भी ज़्यादा सटीक थीं.

इसके अनुसार, इराक़ की हालत एक क़ब्रगाह की तरह बन गई है और यह लगातार बद से बदतर होती जा रही है.

प्रस्ताव

बेकर- हिल्टन रिपोर्ट एक तरह से अमरीकियों को इराक़ से बाहर जाने का एक प्रस्ताव के समान था और इसके अनुसार इराक़ में लड़ाई के लिए अमरीका ख़ुद युद्ध करने के बजाए इराक़ी फौज को इसके लिए प्रशिक्षित करने के लिए वहाँ की सेना को प्रेरित करना था और इसके बाद समस्या के समाधान के लिए कूटनीतिक प्रयास करने की बात थी.

इधर सऊदी अरब इराक़ पर अमरीका के नेतृत्व में 2003 में किए गए हमले से उत्पन्न हालात के बारे में पहले से ही काफ़ी चिंतित था और उसकी यह चिंता लगातार बढ़ती ही गई.

ख़बरों के मुताबिक़ यह संभावना व्यक्त की गई कि सऊदी अरब अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय की सुरक्षा के लिए इराक़ के मामलों में हस्तक्षेप करे लेकिन ऐसा वह तभी कर सकेगा जब अमरीका इराक़ से निकल जाए.

शायद यह भी एक वजह है जिसके कारण अमरीका इराक़ से निकलने की योजना को टालता रहा है.

सऊदी अरब इस बात को लेकर भी सचेत है कि इराक़ पर हमले के बाद ईरान को सबसे ज़्यादा लाभ हुआ है क्योंकि अमरीका ने इराक़ पर हमला कर न सिर्फ़ सद्दाम को हटा दिया बल्कि इस क्षेत्र से सुन्नियों के वर्चस्व को भी समाप्त कर दिया.

यह ईरान के लिए काफ़ी संतोष की बात है कि आज इराक़ी सरकार और सेना के शीर्ष पदों पर शिया समुदाय के लोग क़ाबिज़ हैं.

इराक़ पर अमरीकी हमला इस क्षेत्र में दूरगामी प्रभाव लाएगा जो सद्दाम की मौत के काफ़ी दिनों बाद तक महसूस किया जाता रहेगा.