शनिवार, 30 दिसंबर, 2006 को 16:22 GMT तक के समाचार
जॉन सिम्पसन
बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के संपादक, बग़दाद से
असाधारण, उतार-चढ़ाव और विवादों से भरी सद्दाम हुसैन की ज़िंदगी का शनिवार सुबह बग़दाद के उपनगरीय इलाक़े में अंत हो गया.
इराक़ी प्रधानमंत्री के दूत और एक सुन्नी मुस्लिम विद्वान उस दल में शामिल थे जो सद्दाम हुसैन को फाँसी की सज़ा दिए जाने के समय वहाँ मौजूद थे.
सद्दाम हुसैन को उत्तरी बग़दाद के ख़दीमिया इलाक़े के एक परिसर 'कैंप जस्टिस' में फाँसी दी गई. इस परिसर में हाल के समय कई और लोगों को भी फाँसी दी गई है.
सद्दाम के साथ ही उनके सौतेले भाई बरज़ान अल तिकरिती और इराक़ के पूर्व मुख्य जज अवाद हामिद अल बंदर को भी मौत की सज़ा सुनाई गई थी लेकिन उस वक़्त ये दोनों साथ नहीं थी.
बरज़ान अल तिकरिती और अवाद हामिद अल बंदर को बाद में फाँसी दी जाएगी.
अंतिम घड़ी में सद्दाम अपने हाथ में पवित्र किताब क़ुरान थामे हुए थे और फाँसी देने के समय उनके लिए इसमें से पंक्तियाँ पढ़ी गईं.
उस समय वे एकदम शांत थे और क़ुरान एक व्यक्ति को देकर कहा कि इसे मेरे मित्र को सौंप दीजिएगा.
फाँसी देने वाले चार लोगों में से एक ने जब सद्दाम से कहा कि आपने देश को तबाह कर दिया तो इस पर उन्होंने शांति और संयम से जवाब दिया.
जब फाँसी का फंदा उनके गले में डाला गया तो वे क़ुरान की कुछ पवित्र पंक्तियों को दोहरा रहे थे.
फाँसी देने वाले ने जब उनके चेहरे पर नकाब डालने की कोशिश की तो उन्होंने इसे पहनने से इनकार कर दिया.
इसके अगले ही पल तख़्ता सरका और सद्दाम की ज़िदगी समाप्त हो गई.
सुन्नियों को झटका
यह भी चिंता थी कि लोगों को विश्वास नहीं होगा कि सद्दाम को फाँसी दे दी गई है इसलिए पूरी प्रक्रिया की वीडियो फ़िल्म भी बनाई गई है.
इसके साथ ही इराक़ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और भयानक अध्याय समाप्त हो गया.
इराक़ी इस घटना को लेकर कैसी प्रतिक्रिया देंगे वो इस बात पर निर्भर करेगा कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि क्या है.
शिया और कुर्द संप्रदाय के लोग सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने से ख़ुश होंगे. वहीं शिया बहुल सरकार इसे समर्थन पाने के लिए इस्तेमाल करना चाहेगी.
उधर राजनीतिक सत्ता की लड़ाई में हार चुके सुन्नियों के लिए एक और झटका है. यह इस बात का प्रमाण है कि पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम में आख़िरकार नुकसान उन्हीं को हुआ है.
ज़ाहिर है सद्दाम हुसैन के जीवन और उससे जुड़े हर पहलू पर लोग बँटे रहे और उनकी मौत के साथ भी यह जुड़ा रहा.
सद्दाम का अर्थ है- संघर्ष करने वाला और सद्दाम ने जीवन भर यही किया. पहले ईरान और फिर बाद में क़ुवैत पर हमला करके.
क्षमादान
जनसंहार के आरोप में उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा वर्ष 2005 में शुरू हुआ. ये हमारे समय के न्यूरेमबर्ग ट्रायल की तरह माना गया.
पहले की तरह यह भी भेदभाव वाला साबित हुआ और निश्चित रूप से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधानिकता नहीं मिली.
सबूत के बारे में सवाल उठाए जा रहे हैं. और तो और सद्दाम के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ नहीं अपनाने के कारण मामले की सुनवाई कर रहे एक वरिष्ठ जज को बदल दिया गया.
उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने क्षमादान की अपील की जिसे सिरे से नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
ये चीजें निश्चित रूप से सद्दाम को देखने के दुनिया के नज़रिए को प्रभावित करती रहेंगी.
लेकिन अब जब वो राजनीतिक क्षितिज पर नहीं हैं, इराक़ी सरकार को उम्मीद है कि वर्ष 2007 अच्छा साबित होगा.