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बुधवार, 08 नवंबर, 2006 को 14:30 GMT तक के समाचार

नरेश चंद्रा
अमरीका में भारत के पूर्व राजदूत

'परमाणु समझौते में अड़चनें आ सकती हैं'

अमरीका में संसदीय चुनाव परिणामों के भारत के लिए अपने फ़ायदे-नुकसान हैं.

एक तो इससे परमाणु समझौते को लेकर राष्ट्रपति बुश के प्रयासों में अड़चनें आ सकती हैं.

यदि यह विधेयक आगामी ‘लेम डक' (संसद के पिछले प्रस्तावों को निपटाने के लिए बुलाई जानी वाली बैठक) सत्र तक पारित नहीं हो पाता है तो आगे जाकर इसमें और दिक्कतें आ सकती हैं.

अब इसमें कैलिफोर्निया से काँग्रेस की महिला प्रतिनिधी नैन्सी पेलोसी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.

मुझे लगता है कि वे आगे जाकर स्पीकर बनेंगी और डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ से वही यह तय करेंगी कि इसे इस सत्र में पारित करने दिया जाए या आगे टाल दिया जाए.

जहाँ तक बात डेमोक्रेट सांसदों की है तो भारत समर्थक लॉबी में वे बहुत ज़्यादा तादाद में हैं. वे चाहें तो इसमें काफी मदद कर सकते हैं.

दूसरे, जो लोग इस दफ़ा चुनाव जीत कर आए हैं उनके संबंध यहाँ बसे भारतीय समुदाय के लोगों से काफी अच्छे हैं. मेरे खयाल से थोड़ी सी कोशिश करनी पड़ेगी कि डेमोक्रेट इस समझौते से संबंधित विधेयक को इसी 'लेम डक' सत्र में पारित होने दें.

मैं समझता हूँ कि भारत को अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन लाने की ज़रूरत नहीं है. हम अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से ही काम करते रहे हैं और प्रधानमंत्री के भी अभी तक के व्यक्तव्यों में ऐसा कुछ नहीं है जिसमें किसी बदलाव की ज़रूरत हो.

हाँ, इतना ज़रूर है कि पहले चूँकि व्हाइट हाउस और सीनेट दोनों में बुश की रिपब्लिकन पार्टी को बढ़त हासिल थी इसलिए इसे पारित कराना ज़्यादा आसान था.

अब दोनों ही पार्टियों के साथ अलग अलग स्तर पर कार्य करना पड़ेगा. वाशिंगटन में यह समस्या रही है कि यदि आप डेमोक्रेट्स के साथ अपने संबंध अच्छे करें तो व्हाइट हाउस में नाराज़गी और यदि डेमोक्रेट्स के साथ बातचीत जारी न रखें तो वहाँ भी नाराज़गी. इसलिए कम से कम आने वाले दो सालों तक दोनों को ही मनाकर चलना पड़ेगा.

(बीबीसी संवाददाता अभिषेक प्रभात से बातचीत पर आधारित)