मंगलवार, 07 नवंबर, 2006 को 11:31 GMT तक के समाचार
अमरीकी संसद के मध्यावधि चुनावों के नतीजे इस बात का संकेत देंगे कि राष्ट्रपति बुश की नीतियों को अमरीकी जनता का कितना समर्थन मिल रहा है.
435 सदस्यीय हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में रिपब्लिकन पार्टी को वर्ष 2004 के चुनाव में 232 सीटें हासिल हुई थी और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को 202 सीटें मिली थीं. एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई थी.
मंगलवार को निचले सदन की सभी सीटों और सीनेट की 100 में से 33 खाली सीटों के लिए मत डाले जा रहे हैं. अभी सीनेट में 55 सीटें रिपब्लिकन पार्टी और 44 डेमोक्रेटिक पार्टी के पास हैं.
चुनाव में बुश प्रशासन की विदेश नीति और आंतरिक अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उछाला जा रहा है. ख़ास कर इराक़ नीति पर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने आक्रामक रूख अपनाया है.
अग़र चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की बात करें तो डेमोक्रेटिक पार्टी सत्तारुढ़ दल से आगे चल रही है.
इराक़ का मुद्दा
राष्ट्रपति बुश और विपक्षी पार्टी के बीच इराक़ के मसले पर वाक् युद्ध चल रहा है.
जॉर्ज बुश का कहना है कि इराक़ से अमरीकी सेना की वापसी हुई तो स्थिति पहले से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो सकती है और वे इराक़ को दोराहे पर नहीं छोड़ना चाहते.
राष्ट्रपति बुश ने पिछले दिनों चेतावनी दी कि यदि इराक़ी राष्ट्र असफल होता है तो उसके तेल से अर्जित होने वाली संपत्ति चरमपंथियों के हाथ लग सकती है और वे ताज़ा हमले कर सकते हैं.
दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि बुश की इराक़ नीति विफ़ल साबित हुई है. इराक़ में अमरीकी सैनिकों पर बढ़ रहे चरमपंथी हमलों को डेमोक्रैट मुख्य मुद्दा बना रहे हैं.
चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की अगुआई कर रहे रैम इमैनुअल ने चुनाव प्रचार में कहा, "इराक़ युद्ध हो या आर्थिक प्रबंधन या फिर कांग्रेस की कार्यशैली, अमरीकी जनता को अलग दिशा की तलाश है और वो डेमोक्रैट दे सकते हैं."
विपक्षी दलों के निशाने पर रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफ़ेल्ड हैं और उनके इस्तीफ़े की माँग भी की गई है.
इस बीच अमरीकी सैन्य पत्रिकाओं ने भी रम्सफ़ेल्ड के इस्तीफ़े की माँग की है और उन पर इराक़ में नियंत्रण खोने का आरोप लगाया है. हालाँकि व्हाइट हाउस ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया है.
इस बीच खुद बुश प्रशासन से जुड़े लोगों के कुछ ऐसे बयान आए हैं जिससे राष्ट्रपति के मुश्किले बढ़ी हैं.
पिछले दिनों विदेश मंत्रालय के अधिकारी अल्बर्टो फ़र्नांडेज़ ने कहा था कि इराक़ में अमरीका की नीति 'अंहकारी और मूर्खतापूर्ण' थी. हालाँकि बाद में उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए माफ़ी माँगी ली थी.
राष्ट्रपति बुश भी इन आरोपों का जवाब सख़्ती से दे रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास इराक़ पर कोई निश्चित कार्ययोजना नहीं है और वो सिर्फ़ विरोध की राजनीति कर रही है.
उन्होंने फ़्लोरिडा में एक चुनावी रैली में कहा, "मुझे पता है कि हम चुनाव में बढ़िया प्रदर्शन करेंगे क्योंकि जब अमरीकी जनता का ध्यान इन दो अहम मुद्दों पर जाएगा तो वो पाएँगे कि हम उनके साथ हैं."
भ्रष्टाचार
वित्तीय घोटालों और सांसदों के आचरण से जुड़े सवाल भी चुनावी फ़िजा में गूँज रहे हैं.
कुछ माह पहले संसद के निचले सदन में रिपब्लिकन पार्टी के नेता टॉम डी ले को भ्रष्टाचार के आरोप में पद छोड़ना पड़ा था. उन्होंने पिछले चुनाव में पार्टी के लिए काफ़ी चंदा इकट्ठा किया था.
एक और सांसद मार्क फोली पर अश्लील ईमेल भेजने का आरोप लगा है.
इसके अलावा बढ़ती बेरोजगारी और राजकोषीय घाटे में हो रही वृद्धि भी चुनाव के अहम मुद्दे हैं.
सर्वेक्षण
इस बीच ताज़ा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से पता चलता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी आगे चल रही है लेकिन कुछ समय पहले की तरह फ़ासला बहुत ज़्यादा नहीं है.
यूएसए टुडे के मुताबिक 51 फ़ीसदी मतदाता डेमोक्रेटिक पार्टी को और 44 फ़ीसदी मतदाता रिपब्लिकन पार्टी के समर्थन में हैं.
पिछले दो हफ़्तों में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त 13 फ़ीसदी से घट कर सात फ़ीसदी रह गई है.
पीयू रिसर्च सेंटर का सर्वेक्षण कहता है कि 47 प्रतिशत मतदाता डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में है और बुश की पार्टी को 43 फ़ीसदी मतदाताओं का समर्थन हासिल है.
भारत का हित
भारत की निगाह भी इन चुनावों पर टिकी हुई है. दोनों देशों के बीच असैनिक परमाणु समझौते को अमल में लाने के लिए इसे अमरीकी संसद का समर्थन मिलना ज़रूरी है.
सीनेट से इस बाबत विधेयक पारित हो चुका है लेकिन निचले सदन यानी हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में अभी इस पर मत विभाजन नहीं हुआ है.
इसलिए अब जब अगली बार कांग्रेस की बैठक होगी तो दलगत स्थिति में भी बदलाव दिखेगा. ऐसे में परमाणु समझौते का समर्थन करने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ी तो इसे पारित कराने में ज़्यादा मुश्किल नहीं होगी.