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मंगलवार, 31 अक्तूबर, 2006 को 20:55 GMT तक के समाचार

इंदुशेखर सिन्हा
बीबीसी संवाददाता, दाफेन, चीन से

‘असेम्बली लाइन’ का देश

चीन में बिताए पिछले एक सप्ताह को अगर एक शब्द में समेटूं तो वो शब्द होगा ‘असेम्बली लाइन’.

किसी भी शहर के किसी भी कारखाने में जाइए बस असेम्बली लाइनें ही दिखती हैं.

कतार में बैठे लोग एक ही तरह से हाथ हिलाते डुलाते नज़र आते हैं, मानो उत्पादन नहीं, यहाँ कोई ‘ऑर्केस्ट्रा’ चल रहा हो.

सोचा, कम से कम एक दिन तो इस ‘ऑर्केस्ट्रा’ से दूर, चीन की कला को अपना दिन समर्पित करूँ.

मै जा पहुँचा दाफेन, जो अपनी ऑयल पेंटिंग्स के लिए जाना जाता है.

लेकिन चीन में ‘असेम्बली लाइन’ से आप भले ही कितना ही पीछा छुड़ाना चाहें, वह आपका पीछा नहीं छोड़ती.

शेंजेन और हुईजो शहर के बीच बसा ये गाँव दाफेन मानो एक प्रदर्शनी सा प्रतीत हुआ.

सड़क पर मेरी बाईं तरफ थीं मोनालिसा– एक नहीं बहुत सारी, वो भी एक कतार में.

लेकिन हर फ्रेम में अपनी उसी अदभुत मुस्कान के साथ. और बाईं तरफ, कुछ खाली कैनवास जिसमें मोनालिसा को उतारा जाना अभी बाकी था.

अब लियोनार्दो दा विंची ने तो न जाने कितने ही वर्ष लगाए होंगे. लेकिन यहाँ एक दिन में छह-सात मोनालिसा तैयार की जाती हैं.

बॉस का आदेश

यहाँ काम कर रहे कलाकारों को ये नहीं पता कि कौन सी कलाकृति किस मशहूर कलाकार ने बनाई है – बस बॉस का आदेश है सो बनाए जा रहे हैं.

हाँ, बॉस के अलावा इनकी कला को अगर कोई और प्रभावित करता है तो वह है संगीत.

अगर मोनालिसा जैसी कोई पेंटिंग बनानी हो तो हल्का फुल्का संगीत चलेगा. लेकिन अगर कोई भड़कीली, रंग-बिरंगी पेंटिंग तैयार करनी हो तो पॉप या रॉक के बिना काम नही चलता.

यहीं मेरी मुलाक़ात हुई शू लीस से. मुझसे रहा न गया सो शिष्टाचार को दरकिनार कर मैंने पूछ ही डाला, '' कब तक नकल करेंगी? कभी कुछ ऑरिजिनल के बारे में भी सोचा है? ''

तपाक से जवाब मिला–'' एक दिन मेरी भी अपनी मोनालिसा होगी, उसी का तो अभ्यास कर रही हूँ…और हाँ, यहाँ कॉपीराइट्स का कोई मसला नहीं– जो मर चुके हैं उनका क्या अधिकार!''

बीबीसी में नौकरी शुरू करते ही ये तो अहसास हो गया था कि तनख्वाह तो कभी इतनी नहीं होगी कि मै अपने घर में मोनालिसा की पेंटिंग या फिर माइकल एंजलो की कोई कृति लगा सकूँगा.

लेकिन आज मैं चीन के दाफेन से दोनों ही को अपने साथ वापस लंदन लिए जा रहा हूँ.