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सोमवार, 23 अक्तूबर, 2006 को 13:36 GMT तक के समाचार

इंदुशेखर सिन्हा
बीबीसी संवाददाता, ग्वांजो, चीन से

जानी-पहचानी सी डगर

सच बताऊँ तो न जाने क्यों ये जगह जानी-पहचानी सी लगती है. कहीं बिल्कुल भारत की तरह लगता है, तो कहीं बिल्कुल पश्चिमी देशों की तरह.

एक तरफ़ तो गगनचुम्बी इमारतें हैं जिन्हें मानो अभी तैयार किया गया हो, वहीं दूसरी तरफ़ देखिए तो ऐसा लगता है मानो वर्षों से यहाँ कुछ बदला ही नहीं.

ख़ास बात ये कि सब कुछ धुंधला-धुंधला सा नज़र आता है– और मेरा मतलब केवल प्रदूषण से नहीं है. तस्वीर नज़र तो आ रही है लेकिन मानों उस पर धूल की एक चादर सी फैली है.

बात 1998 की है. सस्ते चीनी माल ने भारत के बाज़ारों में अपनी जगह बनानी बस शुरू की थी और भारतीय व्यापार संघों ने एक सुर में विरोध छेड़ा हुआ था.

मुक़ाबला....मुक़ाबला..

चीनी प्रशासन की प्रतिक्रिया के सिलसिले में चीनी दूतावास के चक्कर लगने शुरू हुए. काफ़ी टालमटोल के बाद आख़िरकार व्यापार मामलों के प्रभारी ने समय तो दिया लेकिन कूटनीति और अर्थशास्त्र के भारी भरकम शब्दों में मात्र एक लिखित बयान ही प्राप्त हुआ.

लेकिन जिस अधिकारी ने मुझे वो बयान सौंपा, वो मुस्कुराते हुए ऐसी बात कर गया जो आज भी मेरे कानों में गुँजती है- "दम है तो (व्यापार में) मुक़ाबला कर के दिखाओ."

क्या भारत चीन से मुक़ाबला कर सकता है?

क्यों ‘मेड इन चाइना’ दुनिया के हर छोटे बड़े बाज़ार पर राज करता है, ‘मेड इन इंडिया’ क्यों पीछे रह गया? बस ऐसे ही कुछ सवाल मुझे चीन तक खींच लाए हैं.