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सोमवार, 16 अक्तूबर, 2006 को 04:18 GMT तक के समाचार

सलीम रिज़वी
न्यूजर्सी से

मेल मिलाप की एक मधुर मिसाल

अमरीका के न्यूजर्सी प्रांत के एक विश्वविद्यालय में कुछ छात्राओं ने एक अनोखी कोशिश के तहत ख़ास तौर पर 'मिड इस्ट को-एकज़िस्टेंस' हाउस बनाया है.

मध्य पूर्व के मामले पर बहस और उसके समाधान के बारे में विचार के लिए इस खास हॉस्टल में सभी धर्मों से जुड़ी छात्राएँ एक साथ रहती हैं जहाँ एक साथ उनके दिन-रात गुज़रते हैं.

कुल ग्यारह छात्राओं ने मिलकर यह फ़ैसला किया कि वह एक साथ रहेंगी और इस विवाद की जड़ तक पहुँचने की कोशिश करेंगी जिससे शायद कोई हल तलाशने में मदद मिल जाए.

इन छात्राओं में पाँच यहूदी, तीन अरब मुस्लिम, एक ईसाई के अलावा एक भारतीय और एक पाकिस्तानी मूल की छात्रा भी शामिल हैं.

इन छात्राओं का मानना है कि अगर खुले रूप से और सहजता के साथ इस मध्य पूर्व के विवाद पर बातचीत और विचारों का आदान-प्रदान किया जाए तो कोई हल तलाशने में मदद ज़रूर मिल सकती है.

साथ रहने के अलावा इस हॉस्टल में रहने वाली हर छात्रा ने मध्य पूर्व मामलों से जुड़े विवाद पर आधारित एक खास कोर्स में भी दाखिला लिया है जिससे इस बारे में जानकारी बढ़ाई जा सके और जो इस विवाद का हल तलाशने की कोशिश में भी मददगार साबित हो.

शुरूआत

सबसे पहले डेनियला जोसेफ़ नामक छात्रा ने इस प्रयोग के बारे में अध्यापकों से ज़िक्र किया तो उन्होंने प्रोत्साहन दिया और अधिकारियों ने मध्य पूर्व मामले के लिए एक अलग रिहाइशी हॉस्टल बनाने का फैसला किया. इसी महीने इसका उदघाटन किया गया.

इक्कीस साल की डेनियला जोसेफ़ इस प्रोजेक्ट की शुरूआत के बारे में कहती हैं, “मैने यहाँ कैंपस में यहूदी और मुस्लिम छात्रों के बीच बेहद नफ़रत देखी, मुझे बहुत हैरत हुई कि क्या इस विवाद का बातचीत के ज़रिए कोई हल नहीं निकाला जा सकता. तभी मैने तय किया कि कुछ करना चाहिए.”

एक साथ एक ही छत के नीचे रहने, खाने पीने, मनोरंजन करने से कुछ बदला.

जोसेफ़ कहती हैं, “जब आप रोज़ सुबह उठिए और साथ वाली छात्रा के साथ दाँत माँजिए, फिर उसके बाद आप उससे नफ़रत तो नहीं कर सकते.”

इस -मिड इस्ट को एकज़िस्टेंस हाउस – नामक हॉस्टल में कई कमरे हैं जिनमें हर एक कमरे में दो लड़कियां रहती हैं. ये सारी छात्राएँ इस हॉस्टल में आने से पहले एक दूसरे के लिए अजनबी थीं लेकिन अब वह सब एक दूसरे के पास आने-जाने में कोई हिचक महसूस नहीं करती हैं. रात के दो बजे तक एक दूसरे के कमरों मे बैठकर बहस और बातचीत करना इनके लिए आम बात है.

अमरीका में इस अनोखे प्रयास को सराहा भी जा रहा है और अब इस प्रयास को दूसरे कैंपसों में भी लागू करने की कोशिश हो रही है. अमरीका भर से बहुत से लोगों ने इन छात्राओं से इसके बारे में पूछताछ करनी शुरू कर दी है.

उन्नीस साल की नादिया शेख़ पाकिस्तानी मूल की हैं और उन्हें इस प्रयास से बहुत उम्मीद है. वे कहती हैं, “जब हम लोग इस हाउस में शामिल हुए उसके बाद हमने गहन विचार-विमर्श शुरू किया. हर मामले पर हम लोग खुलकर बहस करते हैं.”

धर्म और संस्कृति

नादिया की अच्छी दोस्त हैं एक और छात्रा भारतीय मूल की रुचि गुप्ता. रूचि के माता पिता मूल रूप से भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के रहने वाले हैं लेकिन रूचि का जन्म अमरीका में ही हुआ था.

वे कहती हैं कि इस तरह के प्रयोग को मध्य पूर्व के अलावा विश्व में विभिन्न स्थानों पर चल रहे विवाद को सुलझाने में भी इसतेमाल किया जाना चाहिए.

रुचि कहती हैं, “मुझे तो 10 अन्य लड़कियों के साथ रहने का आइडिया बहुत अच्छा लगा. और साथ में विचार विमर्श करके मध्य पूर्व जैसे कई अहम विवादों को सुलझाने के रास्ते खोजने में भी मुझे बहुत दिल्चस्पी थी.”

वे कहती हैं,“मेरे माता पिता ने जब सुना कि मैं मुस्लिम और यहूदी लड़कियों के साथ रहना चाहती हूँ तो वो खुश नहीं थे. उन्हें लगा कि मैं तो अभी अपने धर्म के बारे में भी बहुत कुछ नहीं जानती हूं. लेकिन जब मैंने अन्य धर्मों और संस्कृतियों के बारे में जानना शुरू किया तो मुझे भी हिंदू धर्म और अपनी संस्कृति से ज्यादा करीब आने में मदद मिली.”

इन छात्राओं का मानना है कि एक दूसरे के धर्मों और संस्कृति के बारे में समझने औऱ उसका आदर करने से मेल मिलाप के ज़रिए कई विवाद सुलझाए जा सकते हैं.

यह सारी छात्राएँ हफ़्ते में एक बार मिलकर मध्य पूर्व के विवाद के हल के बारे में विचार विमर्श करती हैं.

एक अन्य इसराइली छात्रा एसटी एटज़बी बताती हैं कि कभी कभी बहस बहुत गर्मागर्म हो जाती है लेकिन यह सिलसिला सहजता और सदभाव के दायरे को लांघता नहीं है.

इस प्रयास को इस कैंपस के बाहर भी ले जाने की योजना है. जोसेफ़ कहती हैं, “हमारा अगला कदम होगा कि इस प्रयोग की शुरूआत दूसरे कैंपसों में भी हो. जहाँ सारे छात्र मिलकर इस विवाद के बारे में खुलकर बात करें और इसे सुलझाने की कोशिश करें.”

वे कहती हैं, “आखिर में तो हमारी यही तमन्ना है कि इसे मध्य पूर्व के उस इलाके में भी लागू किया जाए जहाँ भारी संख्या में अरब मुस्लिम और यहूदी रहते हैं जो एक दूसरे की शक्ल तक देखना नहीं चाहते हैं.”

क्या उनका यह सपना साकार होगा? सपने हों तभी संभावनाएँ हैं.