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शुक्रवार, 06 अक्तूबर, 2006 को 07:49 GMT तक के समाचार

बुर्क़े पर स्ट्रॉ के बयान से विवाद

ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ का कहना है कि जो मुसलमान महिलाएँ बुर्क़ा पहनती हैं वो विभिन्न समुदायों के बीच संबंधों को कठिन बनाती हैं.

एक अख़बार में लिखे लेख में उन्होंने कहा है कि बुर्क़ा एक तरह से 'अलग रहने और दिखने की घोषणा है' और उन्होंने मिलने के लिए आने वाली मुसलमान महिलाओं से बुर्क़ा उतारने का अनुरोध करना शुरू कर दिया है.

जैक स्ट्रॉ के इस बयान पर ब्रिटेन के इस्लामी मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि सांसद जैक स्ट्रॉ का यह बयान भेदभाव करने वाला है.

लेकिन मुस्लिम काउंसिल ऑफ़ ब्रिटेन ने कहा है कि वे जैक स्ट्रॉ की असुविधा को समझ सकते हैं.

जैक स्ट्रॉ ब्रिटेन के ब्लैकबर्न संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते हैं जहाँ एक चौथाई आबादी मुसलमानों की है. सांसद स्ट्रॉ का कहना है कि वे बयान देने से पहले इस पर विचार कर चुके हैं.

दिक़्कत

जैक स्ट्रॉ ने 'लैंकाशर इवनिंग टेलीग्राफ़' नामक अख़बार छपे अपने लेख में लिखा है कि यह उनकी आशंका है कि "बुर्के से पूरी तरह से ढँका हुआ चेहरा दो समुदायों के बीच बेहतर और सकारात्मक संबंध को और कठिन बनाता है."

उनका कहना है कि यदि महिलाएँ अपनी नाक और अपना मुँह भी खुला रखें तो सही मायनों में आमने-सामने बात हो सकती है.

स्ट्रॉ का कहना है, "इससे देखा जा सकता है कि सामने वाला व्यक्ति क्या कह रहा है, न कि केवल सुना जा सके कि वह क्या कह रहा है."

सांसद स्ट्रॉ का कहना है कि जब वह अपनी किसी मतदाता से कहते हैं कि वह अपना मुँह और नाक खुला रखें तो वे सुनिश्चित करते हैं कि कमरे में कोई अन्य महिला भी ज़रुर मौजूद हो और अब तक किसी भी महिला ने इसका विरोध नहीं किया है.

ग़ौरतलब है कि जैक स्ट्रॉ पहले सिर पर स्कार्फ़ बाँधे जाने के अधिकार के पक्ष में रहे हैं. उन्होंने बीबीसी के एक कार्यक्रम में कहा, "जो लोग बुर्क़ा पहनते हैं क्या वे समुदायों के बीच रिश्तों पर पड़ने वाले असर के बारे में सोचेंगे?"

नाराज़गी

लेकिन स्ट्रॉ के इस बयान से कई मुस्लिम संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

इस्लामी मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन मसूद शादजारेह ने कहा है, "यह आश्चर्यजनक है कि जैक स्ट्रॉ ने धार्मिक आधार पर भेदभाव किया."

वहीं नागरिक अधिकार समूह की हलीमा हुसैन ने कहा, "जो धर्म जैक स्ट्रॉ का नहीं है उसके प्रतीकों के बारे में टिप्पणी करने वाले वे कौन होते हैं?"

'प्रोटेक्ट-हिजाब' यानी बुर्क़े की रक्षा के नाम से संगठन चलाने वाली रजनारा अख़्तर का कहना है कि यह बयान 'नासमझी' को दिखाता है.

वहीं जैक स्ट्रॉ के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और लिबरल डेमोक्रेट के संवैधानिक मामलों के प्रवक्ता साइमन ह्यू ने पूछा है कि जैक स्ट्रॉ को क्या अधिकार भी है कि वह यह टिप्पणी करें कि लोग क्या पहनें और क्या न पहनें.

जबकि कंज़रवेटिव पार्टी के ओलिवर लेटविन ने इस सुझाव को ख़तरनाक बताया है.

बहस का सुझाव

वहीं लेबर पार्टी की हैज़ल ब्लियर्स ने कहा कि इसे लेकर मुसलमान महिलाओं के बीच बहस होनी चाहिए.

लेकिन उन्होंने सफ़ाई दी कि यह मसला एक संसदीय क्षेत्र का है न कि सरकार के स्तर का.

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि यह सरकार के लिए उपयुक्त होगा कि वह यह क़ानून बनाए कि कौन क्या पहनेगा और क्या नहीं."

वहीं मुस्लिम काउंसिल ऑफ़ ब्रिटेन के डॉ दाऊद अब्दुल्ला का कहना है कि यह किसी मुसलमान महिला का अपना निर्णय हो सकता है कि वह अपने बुर्क़े का कितना हिस्सा खुला रखना चाहती है.

उनका कहना है कि इसे लेकर मुस्लिम विद्वानों का मत अलग-अलग है.

डॉ अब्दुल्ला ने कहा, "हमारी राय में यदि बुर्क़े से असुविधा हो रही है और यदि इसे हटाया जा सकता है तो ऐसा कर लेना चाहिए."

हालाँकि उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए अपने बालों को ढँकना अनिवार्य हैं.