सोमवार, 18 सितंबर, 2006 को 10:14 GMT तक के समाचार
चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने कहा है कि लेबनान में भेजे जाने वाले संयुक्त राष्ट्र शांतिबल में चीनी सैनिकों की संख्या बढ़ाकर एक हज़ार की जाएगी.
वेन जियाबाओ ने ये घोषणा इटली के प्रधानमंत्री रोमानो प्रोदी से मुलाक़ात के बाद की.
इस तरह की घोषणा के बारे में पिछले हफ़्ते से संकेत मिल रहे थे.
चीनी प्रधानमंत्री ने कहा, चीन लेबनान की स्थिति को लेकर चिंतित है और उम्मीद करता है कि विवाद सुलझ जाएगा.
इस क़दम के बाद चीन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षाबल के लिए सबसे बड़ी संख्या में सैनिक भेजने वाले देशों की सूची में शामिल हो जाएगा.
इससे ये संकेत भी लगाया जा रहा है कि चीन उन इलाक़ों में अपने कूटनीतिक प्रयास ते़ज़ कर रहा है जिन्हें अब तक वो अहम नहीं समझता था.
कूटनीतिक बदलाव
इटली के प्रधानमंत्री ने कहा है कि चीन का ये क़दम दर्शाता है कि चीन बड़ी कूटनीतिक भूमिका की ओर बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी ले रहा है.
इससे पहले चीन संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में सक्रिय भूमिका निभाने से कतराता रहा है.
लेकिन जैसे-जैसे चीन की अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही है, अमरीका और यूरोपीय संघ कहते रहे हैं कि चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाए.
चीन की विदेश नीति में भी बदलाव देखने को मिला है ताकि तेल जैसे संसाधन उसे आसानी से मिल सकें.
हिज़्बुल्ला और इसराइल के के बीच लड़ाई छिड़ने से पहले चीन ने लेबनान में यूनीफ़िल के लिए 180 सुरक्षाकर्मी भेजे थे.
मध्य पूर्व में पहली बार चीन ने अपने सैन्यकर्मियों को भेजा था.
संयुक्त राष्ट्र चाहता है कि प्रस्ताव नंबर 1701 के तहत वो लेबनान में सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ाकर पंद्रह हज़ार कर दे.
इस प्रस्ताव के अनुसार संयुक्त राष्ट्र बल लेबनान की सेना की मदद करेंगे ताकि उन इलाक़ों पर नियंत्रण किया जा सके जो वर्ष 2000 में इसराइल के हटने के बाद से हिज़्बुल्ला के पास थे.
1978 के बाद से दक्षिणी लेबनान में करीब दो हज़ार यूनीफ़िल सैनिक तैनात हैं और ये सैनिक क्रमवर तरीके से बदलते रहते हैं.
इस वर्ष जुलाई-अगस्त में चरमपंथी संगठन हिज्बुल्ला और इसराइल के बीच करीब 34 दिन लड़ाई चली थी. अगस्त में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद युद्धविराम हो पाया था.
इस लड़ाई में लेबनान के करीब ग्यारह सौ लोग मारे गए थे जिसमें ज़्यादातर आम नागरिक थे. वहीं 150 से ज़्यादा इसराइली लोगों की लड़ाई के दौरान मौत हुई. इनमें ज़्यादातर सैनिक शामिल थे.