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शनिवार, 09 सितंबर, 2006 को 11:23 GMT तक के समाचार

आरिफ़ जमाल
वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान

पाकिस्तान: मुशर्रफ़ सरकार की मुश्किलें

ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ़ को अपनी राजनीतिक जीवन का सबसे मुश्किल फ़ैसला करना पड़ा. ये फ़ैसला उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा जुआ भी था.

लेकिन इस घटना के पाँच साल बाद यही लग रहा है कि जनरल मुशर्रफ़ और उनका देश यह लड़ाई हार रहे हैं.

अमरीका की अगुआई वाले गठबंधन में शामिल होने से पहले परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपने संबोधन में देशवासियों को बताया था वे कश्मीर मामले और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं.

11 सितंबर के पाँच साल बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर मामले और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर थोड़ी बहुत जो हमदर्दी थी, वो बहुत कम हो गई है और लगातार कम हो रही है.

दुनिया कश्मीर में चल रहे जेहाद को आतंकवाद और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को दुनिया के अमन के लिए बहुत बड़ा ख़तरा समझती है.

इसकी वजह पाकिस्तान की इस्लामवादी विचारधारा भी है. आज दुनिया समझ रही है कि कश्मीरी मुजाहिदीन पश्चिमी देशों में जेहाद के लिए तैयार किए जा रहे हैं.

और पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम एक दिन उनके हाथ आ जाएगा. पश्चिमी देश पिछले पाँच साल से पाकिस्तान पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं.

9/11 के बाद कई मौक़े पर पाकिस्तान की सरकार ने कहा कि अगर वे अमरीका के गठबंधन में शामिल नहीं होते तो अमरीका पाकिस्तान के साथ वही व्यवहार करता जो उसने अफ़ग़ानिस्तान के साथ किया.

मगर सच्चाई यही है कि पाकिस्तान भी क़रीब-क़रीब उसी रास्ते पर चल रहा है जिस रास्ते पर उससे पहले अफ़ग़ानिस्तान चल चुका है.

किस रास्ते पर पाकिस्तान

क्या पाकिस्तान का भविष्य भी अफ़ग़ानिस्तान के जैसा ही होगा- आज यही सवाल कई पाकिस्तानी पूछ रहे हैं. पाँच साल बाद पाकिस्तान की सरकार अपने कई इलाक़ों में अपना नियंत्रण खो रही है.

साथ ही इस्लामिक और कट्टरपंथी राष्ट्रवादी अपना असर बढ़ा रहे हैं. देश में जातीय हिंसा बढ़ रही है और देश में क़ानून-व्यवस्था की स्थिति काफ़ी ख़राब होती जा रही है.

ऐसा लगता है कि क़बायली इलाक़ों में पाकिस्तानी सेना तालेबान विद्रोहियों के हाथों हार चुकी है. पिछले चार सालों के दौरान उत्तरी और दक्षिणी वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना को बहुत नुक़सान हुआ है.

लेकिन सेना अल क़ायदा और तालेबान के पाकिस्तानी साथियों को हरा नहीं पाई है. अल क़ायदा और तालेबान विद्रोहियों ने क़बायली इलाक़े के बहुत बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया है और वहाँ अपने इस्लामी क़ानून चला रहे हैं.

और तो और जिन क़बायली इलाक़ों में अल क़ायदा और तालेबान विद्रोहियों ने क़ब्ज़ा नहीं किया है, वहाँ लड़ाई जारी है. ऐसा लगता है कि जल्द ही तालेबान पूरे क़बायली इलाक़े पर अपना क़ब्ज़ा कर लेंगे.

यही कारण है कि पाकिस्तानी सेना ने पाँच सितंबर को क़बायली इलाक़े के विद्रोहियों से एक शांति समझौता किया है. ये समझौता इस बात का सबूत है कि पाकिस्तानी सेना को क़बायली इलाक़े में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

लेकिन यह मुश्किल लगता है कि इस समझौते से स्थायी शांति मिल पाएगी. दरअसल इससे तालेबानी और मज़बूत होंगे.

अब तो तालेबान का प्रभाव क़बायली इलाक़े से अन्य इलाक़ों में भी पहुँचने लगा है. बन्नू खाँ और डेरा इस्माईल खाँ जैसे इलाक़ों में भी तालेबान अपना सिर उठा रहे हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि पेशावर तक तालेबान का असर दिखने लगा है.

पिछले पाँच सालों के दौरान बलूचिस्तान में भी राष्ट्रवाद ने ज़ोर पकड़ा है और पाकिस्तान सरकार के ख़िलाफ़ बलोच जनता उठ खड़ी हुई है.

पाकिस्तानी सेना के हाथों नवाब अकबर बुगटी के मारे जाने के बाद बलोच लोगों का ग़ुस्सा और भड़क गया है. हालाँकि बलूचिस्तान की स्थिति का 9/11 से कोई सीधा संबंध नहीं है.

लेकिन अगर पाकिस्तान 9/11 के बाद अमरीका का सहयोगी नहीं बनता तो ऐसी स्थिति शायद नहीं आती.

कमज़ोर लोकतंत्र

इसके साथ-साथ इस्लामी शक्तियों ने सिंध और पंजाब में भी अपना असर बढ़ाया है. पाकिस्तानी कश्मीर में भी इस्लामी ताक़तें प्रभावशाली हुई हैं. ऐसा लगता है कि आने वाले वर्षों में यहाँ भी इस्लामी ताक़तों का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा.

पिछले पाँच वर्षों में पाकिस्तान में इस्लामी ताक़तें मज़बूत हुई हैं और लोकतांत्रिक ताक़तें कमज़ोर हुई हैं. इस्लामी ताक़तें और रक्षा मामले से जुड़े लोग अहम मुद्दों पर एक ही तरह की सोच रखते हैं.

इससे उलट रक्षा मामले से जुड़े लोग और लोकतांत्रिक शक्तियाँ अलग-अलग राय रखतीं हैं. यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक शक्तियाँ लगातार कमज़ोर हुई हैं.

पिछले पाँच वर्षों में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है यहाँ की जनता. उनके कई अधिकार छीन लिए गए हैं. अब बात यहाँ तक आ पहुँची है कि ख़ुफ़िया एजेंसियाँ किसी को बग़ैर कुछ बताए पकड़ कर ले जाती हैं.

पिछले कुछ महीनों में बहुत से बलोच राष्ट्रवादी अगवा हुए हैं. माना जाता है कि इसके पीछे ख़ुफ़िया एजेंसियों का ही हाथ है.

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के शासन के पहले दो वर्षों में पश्चिमी देशों ने उनकी भरपूर आलोचना की लेकिन 9/11 के बाद वे पश्चिम में एक पसंदीदा नेता के तौर पर उभरे.

अगर 9/11 के हमले नहीं होते, तो शायद जनरल मुशर्रफ़ की सरकार बची ही नहीं रहती. 9/11 के कारण ही पाकिस्तान में एक और बड़ी तानशाही क़ायम है.