शुक्रवार, 25 अगस्त, 2006 को 12:37 GMT तक के समाचार
वुसतउल्लाह ख़ान
बीबीसी संवाददाता, बेरूत से
गोगराज अब से 25 बरस पहले होशियारपुर से सीरिया पहुँचा और वहाँ से लेबनान ऐसा आया कि पलट कर नहीं देखा.
पिछले पाँच वर्षों से गोगराज और उसकी बीवी जूनिया में एक कंटेनर के अंदर एक कमरे में रहते हैं और बराबर वाले कमरे में ‘बालकनाथ शिव केसरी मंदिर’ है.
गोगराज सिर्फ़ तीन घंटे सोता है. सुबह पाँच बजे एक फ़ार्म पर जाता है, वहां से ताज़ा खीरे बैंगन और टमाटर लेकर सब्ज़ी मंडी पहुँचता है, बेचता है और फिर दस बजे पार्किंग लॉट में पहुँचकर रात डेढ़ बजे तक हर आने जाने वाली गाड़ी को पर्ची देकर पैसे लेता है.
रोज़ाना के ख़र्च से जो पैसा बच जाता है वह गोगराज मंदिर पर लगा देता है. अब तक गोगराज इस मंदिर पर अपनी जेब से चार-पाँच हज़ार डॉलर लगा चुका है.
मंदिर में हर प्रकार के देवी-देवता मौजूद हैं और उन्हीं के बीच ईसा, मरियम, और सेंट पॉल की भी मूर्तियां हैं. गोगराज का कहना है कि इस मंदिर के लिए ज़मीन पार्किंग लाट के ईसाई मालिक ने दी है.
जूनिया में बहुमत ईसाईयों की है, भगवान तो सब का एक ही है इस लिए मंदिर में ईसाइयों के देवी देवता क्यों नहीं रह सकते.
गोगराज का कहना है कि जन्माष्टमी के अवसर पर यहाँ दो सौ लोग तक आ जाते हैं.
मैं गोगराज के साथ कोई 30 मिनट रहा, इस दौरान वह मुझसे बात भी करता रहा और भाग-भाग कर पार्किंग लॉट में आने वाली गाड़ियों को पर्ची भी देता रहा.
मुझे और ड्राइवर को आम का शरबत पिलाया, गेरूए रंग की पगड़ी बांधकर और मंत्र छपी चादर ओढ़कर पालथी मार कर भी बैठा.
कहने लगा तुम घंटी बजाओ मैं तुम्हारे लिए दिया जलाता हूँ. जब वह दिया जला रहा था तो उसके मोबाइल पर एक फोन आया. मंदिर में रिंगटोन बज उठा,
ऐ दिल तुझे क़सम है हिम्मत न हारना,
दिन ज़िंदगी के जैसे भी गुज़रें गुज़ारना.....
लेबनान में गुज़ारे तीस दिन में यह पहला क्षण था जब मेरी आंखों में आंसू आए थे.
चलो आगे चलते हैं, मैंने ड्राइवर से कहा, साइड मिरर में गोगराज देर तक नज़र आता रहा.