शुक्रवार, 18 अगस्त, 2006 को 03:18 GMT तक के समाचार
सलीम रिज़वी
न्यूयॉर्क से
शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि भारत सरकार के किसी फ़ैसले का अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के आम जीवन पर इस हद तक असर पड़ रहा है.
अमरीका में दालों की ज़बरदस्त क़िल्लत हो रही है और दाल खाने वाले दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को दाल दोगुने और तिगुने दाम में ख़रीदनी पड़ रही है.
वजह यह है कि भारत ने अपने यहाँ से दाल के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है.
भारत में फसल अच्छी न होने की वजह से दाल की कमी के ख़तरे से निपटने और दाल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी रोकने के लिए इसके निर्यात पर रोक लगाई गई है.
भारत से आने वाली दाल पर अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग इस क़दर निर्भर करते हैं इसका शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं रहा होगा.
जब भारत से दालों का निर्यात बंद हो गया तो इससे अमरीका में दाल के दाम आसमान छूने लगे.
जिन दालों की क़िल्लत हो रही है और जिससे दाम बढ़ रहे हैं उनमें मसूर, अरहर, मूंग, माश और चने की दालें शामिल हैं.
बढ़े दाम
पहले जहाँ इन दालों के पाँच पाउंड के एक पैकेट का दाम तीन डॉलर था वहीं अब यह बढ़कर 10 डॉलर के क़रीब हो गया है.
न्यूयॉर्क के जैक्सन हाइट्स इलाके में एक स्टोर के मालिक टोनी का कहना है कि जब भारत से दाल नहीं आ रही है तो उनकी कोशिश है कि दूसरे देशों से दाल मंगाएँ क्योंकि दाल की बहुत ज़्यादा माँग रहती है.
भारतीय और पंजाबी मूल के स्टोर मालिक टोनी का कहना है, "हमारे स्टोर में ग्राहक कहते हैं कि यह तो भारत जैसा हाल हो गया है. यहाँ दाल का दाम इतना बढ़ गया है कि दाल ख़रीदने में आम लोगों को परेशानी हो रही है."
अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के ज़्यादातर लोग खाने में दाल खाते हैं और जो मांसाहारी नहीं हैं उन्हे तो खाने में दाल चाहिए ही चाहिए.
इसके अलावा भारत के अलग-अलग इलाक़ों से आने वाले लोग कई तरह के पकवानों में दाल का इस्तेमाल करते हैं.
भारत के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेशी मूल के लोग भी दाल का सेवन करते हैं.
परेशानी
इस कमी को देखते हुए बहुत से लोगों ने तो अपने घरों में दाल का स्टॉक रखना भी शुरू कर दिया है. इससे दामों में और भी बढ़ोत्तरी होने की आशंका जताई जा रही है.
दाल के दाम बढ़ने से क्या दाल के सेवन में कुछ कमी आई है. स्टोर मालिकों के मुताबिक़ लोग दाल कम ख़रीद रहे हैं लेकिन अब भी ख़रीद रहे हैं.
साथ खड़े एक ग्राहक ने कहा कि दाल तो रोज़ खाते हैं और खाना ही पड़ेगा, जो भी हो जाए.
एक स्टोर में भारतीय मूल की उमा अमीन दाल का एक पैकेट उठा कर परेशान स्वर में बोलीं, "दाल का दाम बहुत ज़्यादा हो गया है, हम लोगों को तो मुसीबत हो गई है. हम लोग तो रोज़ दाल खाते थे लेकिन अब कम ख़रीद रहे हैं. अब हफ़्ते में तीन बार खाते हैं."
उनका कहना था कि उनका बजट इसके कारण ख़राब हो गया है और वह अब एक और नौकरी ढूँढ रही हैं जिससे घर का ख़र्चा चलाया जा सके.
25 वर्षों से इस धंधे में रहने वाले स्टोर मालिकों के मुताबिक़ अमरीका में दालों के दाम बढ़ने की परेशानी इससे पहले कभी नहीं देखने मे आई.
'खट्टे अंगूर...'
दाल के दाम बढ़ने से रेस्तरां में भी दाल के दाम बढ़ गए हैं और कुछ रेस्तरां तो दाल की जगह सब्ज़ी बनाने लगे हैं.
मंजीत सिंह जैक्सन डाइनर के मालिक हैं जहाँ एक हफ़्ते में 50 किलो के क़रीब दाल की खपत होती है पर वह कहते हैं कि उन्होने अब दाल बनाना कम कर दिया है.
इसी कारण से मिठाई की दुकानों में भी मिठाई के दाम बढ़ गए हैं. दाल के दामों में बढ़ोत्तरी के कारण अब यह भी आशंका जताई जा रही है कि फ्रोज़न फ़ूड के भी दाम बढ़ा दिए जाएँगे.
भारत के अलावा भी कुछ देशों से अमरीका में दाल मंगाई जाती है जैसे ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, कीनिया, मैक्सिको, कनाडा लेकिन जो मज़ा भारतीय लोगों को भारत की दाल खाने में आता है वह और किसी देश की दाल में नहीं आता.
यही कारण है कि अब बाज़ार में जो कुछ बची-खुची भारतीय मूल की दाल है उसे दोगने और तिगुने दामों पर बेचा जा रहा है.
पूरे अमरीका में जहाँ-जहाँ भारतीय मूल या दक्षिण एशियाई मूल के लोग रहते हैं उन्हें इस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. लॉस एंजेलेस, शिकागो, ह्यूस्टन, मायामी सहित सभी शहरों में दाल का अकाल पड़ गया है.
इस क़िल्लत के कारण लोगों को आटे का तो नहीं पर हाँ दाल का भाव ज़रूर समझ में आने लगा है.