बुधवार, 09 अगस्त, 2006 को 17:15 GMT तक के समाचार
हिज़्बु्लला के विरुद्ध लड़ाई में इसराइली प्रधानमंत्री यहूद ओल्मर्ट की राजनीतिक साख ही नहीं बल्कि उनका पूरा भविष्य दाँव पर लगा हुआ है, यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें वे हर हाल में जीत हासिल करना चाहते हैं.
लेकिन यह लड़ाई एक ऐसे दुश्मन के साथ है जो बार-बार ठिकाने बदलता है, हर जगह मौजूद है और उसे लोगों का समर्थन भी हासिल है.
ऐसे में सवाल यही उठता है कि आख़िर कब और कैसे तय होगा कि इसराइल ने जीत हासिल कर ली है. ओल्मर्ट बार-बार यही कहते हैं, "हमें यह लड़ाई जीतनी होगी, हम यह लड़ाई जीतकर रहेंगे."
एक महीने पहले ओल्मर्ट ने कहा था कि वे हिज़्बुल्ला का सफ़ाया करके ही दम लेंगे, उनके जनरलों ने उन्हें बताया था कि हवाई हमले से ही हिज़्बुल्ला का काम तमाम हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसराइल को अपने सैनिक भेजने पड़े.
इसराइली नेतृत्व अपने नागरिकों को दिखाना चाहता है कि उसने रॉकेट दाग़ने वाले हिज़्बुल्ला के ख़तरे को समाप्त कर दिया है.
इसराइल के एक वरिष्ठ मंत्री मियर शितरित इन बदली हुई परिस्थितियों में इसराइल की जीत की परिभाषा बताते हैं, "मेरी जीत की परिभाषा होगी उत्तरी इसराइल में शांति, रॉकेटों के ख़तरे को समाप्त करना, उत्तरी इसराइल के लोगों मन से डर को हटाना."
दरअसल, लेबनान का नाम इसराइलियों के दिमाग़ में एक ऐसे मोर्चे के तौर पर आता है जहाँ जीतना उनके लिए पहले भी संभव नहीं हो सका है.
हिज़्बुल्ला के विद्रोही अब से छह वर्ष पहले इसराइली सेना को लेबनान से बाहर निकलने पर विवश कर चुके हैं.
इसराइली सेना के लिए रणनीति तैयार करने वाली संस्था के प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल श्लोमो ब्रोन कहते हैं कि हिज़्बुल्ला को हराना आसान नहीं है.
उनका कहना है, "लेबनान में जीत की परिभाषा तय करना मुश्किल है, आप एक छापामार सेना को किस तरह हरा सकते हैं, ज़मीन पर कब्ज़ा करके यह काम नहीं होगा, छापामार आम आबादी में घुलमिल जाते हैं और उन्हें पूरी तरह ख़त्म करना मुश्किल हो जाता है, जिस तरह इराक़ में दिख रहा है."
युद्धविराम सही शर्तों पर हो इसे ही इसराइल अपनी जीत मानेगा, अगर इसराइल हिज़्बुल्ला को समाप्त नहीं कर सकता तो वह कूटनीतिक स्तर पर जीत हासिल करने की कोशिश करेगा.
यहूद ओल्मर्ट के नेतृत्व में पहली बार लड़ाई लड़ी जा रही है, इसराइल के लिए जीत का लक्ष्य बहुत कठिन है जबकि हिज़्बुल्ला का जीवित रहना ही उसकी जीत है.