सोमवार, 07 अगस्त, 2006 को 16:53 GMT तक के समाचार
शिवकांत
संपादक, बीबीसी हिंदी रेडियो
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का मानना था कि “असली नेता वह है जो आने वाले कल, महीने और साल की घटनाओं को भाँप सके और उनके न होने पर उसकी वजह भी समझा सके.”
अपनी सारी ख़ूबियों के बावजूद ब्रिटेन के वर्तमान प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर इस कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए हैं.
अफ़ग़ानिस्तान को तालेबान से निजात दिलाने की बात हो या सद्दाम हुसैन के विनाशकारी हथियारों से मुक्ति दिला कर इराक में लोकतंत्र की स्थापना करने की बात, टोनी ब्लेयर अपने इरादों और वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं.
लेकिन उससे भी बड़ी मायूसी की बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिस प्रभाव को हासिल करने के लिए उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति बुश का आँख मूँद कर साथ निभाया, वही प्रभाव आज लेबनान के संकट की घड़ी में बेकार साबित हो रहा है.
टोनी ब्लेयर की लेबर पार्टी के ही कई सांसदों का कहना है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री होने के बावजूद, लेबनान के संकट पर ब्लेयर न तो अपनी पार्टी के विचारों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और न ही देश की जनभावना का.
तत्काल युद्धविराम की माँग करना तो दूर उन्होंने तो युद्धविराम के प्रस्तावों को रुकवाने की कोशिशें की हैं.
राष्ट्रपति बुश और उनके प्रशासन का पिछलग्गूपन उनके राजनीतिक क़द को दुनिया में ही नहीं अपने देश में भी घटा रहा है.
टोनी ब्लेयर को अभी लाचार प्रधानमंत्रियों की श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता लेकिन उन से हुए मोहभंग का आलम यह है कि लोगों को लेबर पार्टी के इतिहास के सबसे सफल और प्रभावशाली प्रधानमंत्री से अब यही जानने की उत्सुकता है कि वे गद्दी कब छोड़ने वाले हैं.
विडंबना यह है कि उनके बयानों की साख इतनी गिर चुकी है कि अब शायद उनकी इस घोषणा पर भी सहसा विश्वास न हो सके.
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शहर का मिज़ाज
लंदन अपने समृद्ध इतिहास के अलावा पूरी दुनिया में अपने गीले और मिज़ाजी मौसम के लिए जाना जाता है.
साल भर यहाँ इतना पानी बरसता है कि इस महानगर की प्यास बुझाने के लिए किसी नदी या बाँध के पानी की ज़रूरत नहीं पड़ती.
बरसात से भरने वाले तालाबों, झीलों और नलकूपों से ही इतना पानी मिल जाता है कि सत्तर लाख की आबादी और ढेर सारे उद्योगों की प्यास बुझा ली जाती है.
इसलिए इस साल यहाँ सूखे के सारे लक्षण नज़र आने के बावजूद विश्वास नहीं होता कि लंदन सूखे की चपेट में है.
पानी की सप्लाई करने वाली निजी जल कंपनियों ने घरों के बग़ीचों और लॉनों में नलकी से पानी देने और कारें धोने पर पाबंदी लगा दी है.
बीस साल में पहली बार लोगों के लॉनों की ज़मीन में सूख कर वैसी दरारें फटने लगी हैं जैसी सूखे तालाबों की तलहटी में फटती हैं.
ज़मीन सूखने से लोगों के घर धँसकने लगे हैं और सार्वजनिक पार्क अब हरे नहीं भूरे रंग के नज़र आते हैं. ब्रितानी पर्यावरणवादी डेविड बैलमी का कहना है कि लंदन पिछले सौ सालों के सबसे भयंकर सूखे की चपेट में है.
हैरत की बात यह है कि ऐसे हालात में भी यहाँ की जल कंपनियाँ नए तालाब या झील बनवाने या फिर नदियों से पानी की व्यवस्था करने की बजाए पुरानी सूखी हुई झीलों को बेचकर पैसा बनाने में लगी हैं.
लगता है कभी झीलों के शहर रहे बंगलौर, जोधपुर और बीकानेर की कहानी यहाँ भी दोहराई जाएगी.
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उधार की संस्कृति
आपने भारत जैसे विकासशील देशों में शहरी आर्थिक विकास, आर्थिक सुधारों और बढ़ती मँहगाई की मार के चलते देहात के किसानों और कामगारों को तो कर्ज़ के बोझ से दबते और आत्महत्याएँ करते सुना होगा.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रिटेन जैसे विकसित और अमीर देशों में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं.
कारण अवश्य भिन्न हैं. पिछले सप्ताह प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार ब्रिटेन में पिछली तिमाही में 26 हज़ार से अधिक लोग कर्ज़ न चुका पाने की वजह से दिवालिया हुए हैं.
कुल मिलाकर इस साल एक लाख से ज़्यादा लोगों के दिवालिया होने की आशंका है.
दिलचस्प बात यह है कि दिवालिया होने वाले अधिकतर लोग उद्यमी या व्यापारी नहीं हैं जो घाटा हो जाने की वजह से दिवालिया हो रहे हों, बल्कि ये वे आम नौकरीपेशा लोग हैं जो क्रेडिट कार्डों और उधार पर हैसियत से ज़्यादा कर्ज़ लेकर दिवालिया हो रहे हैं.
इससे पहले अस्सी के दशक में आसमान छूती ब्याज दरों की वजह से दिवालिया होने वालों की संख्या बढ़ी थी लेकिन इस बार मकानों के दाम बढ़ने और उधार की संस्कृति का चलन बढ़ने की वजह से दिवालियापन बढ़ रहा है.
उल्लेखनीय बात यह है कि एक ओर जहाँ हज़ारों लोग दिवालिया हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर आसान शर्तों पर कर्ज़ देने वाले बैंकों के मुनाफ़े भी बढ़ रहे हैं.
आप किसी भी चीज़ को गिरवी रख कर किसी भी चीज़ के लिए कर्ज़ ले सकते हैं. लुभाने के लिए आपको साल-साल भर बिना ब्याज के या मामूली ब्याज पर कर्ज़ मिल जाता है.
लोग ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की लय में कर्ज़ लेते जाते हैं और उसके हद से गुज़र जाने पर दिवालिया हो जाते हैं. उधार की संस्कृति जड़ें जमा चुकी है.