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शुक्रवार, 28 जुलाई, 2006 को 11:24 GMT तक के समाचार

ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, लंदन

इतिहास बदलने वाला स्वेज़ नहर संकट-1

अब से ठीक पचास साल पहले की बात है- 26 जुलाई 1956, मिस्र में शाम ढलने को थी. राष्ट्रपति जमाल अब्दल नासिर रेडियो पर राष्ट्र के नाम संदेश देनेवाले थे.

वहाँ के कुछ अधिकारियों को भी उस संदेश में छिपे कोडवर्ड का इंतज़ार था.

कोडवर्ड था- डे लेसेप्स यानि उस फ़्रांसीसी इंजीनियर का नाम जिसने भूमध्यसागर और लाल सागर को जोड़ने वाली स्वेज़ नहर का निर्माण किया था.

राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर के राष्ट्रीयकरण का ऐलान किया और कोडवर्ड तीन बार दोहराया.

स्वेज़ नहर घटना पर बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति

वे शायद ये सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके लोग कोडवर्ड ठीक से सुन लें.

उस वक़्त शाम के सात बज चुके थे और स्वेज़ नहर कंपनी मुख्यालय की रात्रिकालीन शिफ़्ट शुरू ही हुई थी.

मिनटों के अंदर मिस्र के अधिकारियों के दस्ते ने धावा बोल दिया.

ब्रिटेन और फ़्रांस के नियंत्रण वाली स्वेज़ नहर कंपनी अब मिस्र की थी. सब कुछ इतना गोपनीय रखा गया कि मिस्र के कई मंत्रियों तक को इसकी ख़बर नहीं थी.

हमले की योजना

द्वितीय विश्व युद्ध की यादें उस समय अभी ताज़ा थीं. ब्रिटेन के स्कूलों में बच्चे पढ़ा करते थे कि उनके देश ने ही वो युद्द जीता था. उन्हें समझाया जाता था ब्रिटेन इज़ बेस्ट यानि ब्रिटेन सर्वश्रेष्ठ है. ब्रितानी सरकार का भी भरोसा यही था कि ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अभी ढला नहीं है.

लेकिन मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने मानो उस भरोसे को हिला कर रख दिया. स्वेज़ नहर विश्व व्यापार की जीवनरेखा थी और वो ब्रिटेन और फ़्रांस के हाथों में थी.

और जब नासिर ने स्वेज़ नहर पर हाथ रखा तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऐंथनी इडेन कुछ वैसे ही बौखला उठे जैसे परी कथाओं में तोते की गर्दन पर हाथ रखते ही शैतान राक्षस छटपटा उठता था.

ऐंथनी इडेन ने उस वक़्त कहा था, "हमारी लड़ाई मिस्र के साथ नहीं है, अरब जगत के साथ भी नहीं है बल्कि कर्नल नासिर के साथ है. हमने उनके साथ इसलिए समझौता किया क्योंकि हमें लगा कि वो अपने लोगों का भला करेंगे लेकिन उन्होंने हमारी दोस्ती का जवाब हमारे देश के ख़िलाफ़ षडयंत्र रच कर दिया है. उन्होंने दिखाया है कि वो ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिनपर भरोसा किया जा सके."

राष्ट्रपति नासिर के क़दम के बाद फिर व्यूह रचना शुरू हुई- ब्रिटेन, फ़्रांस और इसराइल के बीच.

इसराइल अपने उपर हो रहे फ़लस्तीनी फ़िदायीन हमलों के लिए राष्ट्रपति नासिर को ज़िम्मेदार मानता था.

तय किया गया कि इसी बात की आड़ लेकर इसरायल मिस्र पर हमला करेगा और हमला शुरू होने के बाद ब्रिटेन और फ़्रांस, मिस्र और इसराइल दोनों ही की सेनाओं को स्वेज़ नहर छोड़ने को कहेंगे.

योजना ये थी कि जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर इंकार करेंगे, जो कि निश्चित था, तो ब्रिटेन और फ़्रांस की सेनाएं उनपर टूट पड़ेंगी और स्वेज़ पर फिर से उनका क़ब्ज़ा हो जाएगा.

इस अभियान का नाम दिया गया था ऑपरेशन मस्केटियर.

इतिहास बदल गया....

मिस्र पर हमला शुरू किया गया और सब कुछ योजना के तहत हो रहा था.

इसराइल ने हमला किया तो राष्ट्रपति नासिर ने भी जवाब दिया और उसके बाद ब्रिटेन और फ़्रांस ने बम बरसाना शुरू कर दिया.

लेकिन योजना में एक बहुत बड़ी गलती थी. ब्रिटेन ने इस बारे में अमरीका को कुछ नहीं बताया था.

वाशिंगटन में राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहावर ग़ुस्से से लाल हो उठे. विश्वयुद्ध के बाद से अटलांटिक महासागर के आर पार जो हनीमून चल रहा था, उसे महाभारत में बदलने में ज़रा भी देर नहीं हुई.

अमरीका ने ब्रिटेन को सीधी धमकी दे डाली और ब्रिटेन में विपक्षी पार्टियों ने भी सरकार को आड़े हाथों लिया और ब्रिटिश साम्राज्य की साख मिट्टी में लोटती नज़र आई.

अंतरराष्ट्रीय इतिहास के जानकार प्रोफ़ेसर इफ़्तिकार मलिक उसे आधुनिक इतिहास के ज़बरदस्त मोड़ के रूप में देखते हैं.

वे कहते हैं,"ब्रिटेन के सदियों पुराने साम्राज्य में ज़बरदस्त तबदीली आई, और ब्रिटेन को अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करना पडा. प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना पडा और काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी, और अमरीका के साथ जो उनके संबंध थे उन पर भी असर पडा.’’

संघर्ष के बाद फ़्रांस और ब्रिटेन की सेनाओं को पीछे लौटना पडा.

अरब जगत में जमाल अब्दल नासिर हीरो बनकर उभरे और अरब राष्ट्रवाद को एक नई जान मिली.

दुनिया का कोई कोना शायद ही इससे अछूता रहा- रूस पर असर हुआ, अफ़्रीका पर असर हुआ, भारत पर असर हुआ, इंडोनेशिया पर असर हुआ, फ़्रांस पर असर हुआ, अमरीका पर भी असर हुआ.

कुछ सपने टूटे, कुछ बिखरे, कुछ नए संजोए गए.

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