गुरुवार, 20 जुलाई, 2006 को 11:48 GMT तक के समाचार
लेबनान पर इसराइली हमले के बारे में फ्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक कह चुके हैं हालाँकि इसराइल को सैनिक कार्रवाई करने के लिए हिज़बुल्ला ने भड़काया है मगर इसराइल भी ज़रूरत से ज़्यादा बलप्रयोग कर रहा है.
शिराक का कहना है कि इसराइल लेबनान के विभिन्न इलाक़ों पर जो बमबारी कर रहा है उनमें ऐसे ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है जिनका शांति बहाल करने के प्रयासों से कुछ लेना-देना नहीं है.
कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने इससे भी आगे जाकर चिंता व्यक्त की है. संयुक्त मानवाधिकार आयुक्त लुइज़ आर्बर ने दोनों पक्षों को चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें युद्धापराध का दोषी भी माना जा सकता है.
इसराइल और हिज़बु्ल्ला के बीच इस लड़ाई से बहुत से क़ानूनी सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनके बारे में बीबीसी के कूटनीतिक मामलों के संवाददाता जोनाथन मार्कस का कहना है कि जवाब ढूंढना बहुत मुश्किल काम है.
युद्ध के नियम-क़ानूनों की बात की जाए तो बल प्रयोग सीमा बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है. इस मामले में जेनेवा संधि का सहायक समझौता बहुत महत्वपूर्ण है जो 1977 में लागू हुआ था.
इस अतिरिक्त समझौते में सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित होने वाले आम लोगों की सुरक्षा के बारे में विस्तार से प्रावधान किया गया है. इस समझौते के बहुत सी धाराएँ और अनुच्छेद ऐसे हैं जो इसराइल और हिज़बुल्ला के बीच मौजूदा लड़ाई के बारे में सटीक बैठते हैं.
निशाने
इस अतिरिक्त समझौते में बिल्कुल साफ़ तौर पर कहा गया है कि किसी भी हमले या बदले की कार्रवाई का निशाना असैनिक ठिकाने नहीं हो सकते और इसमें असैनिक ठिकानों को सैनिक ठिकानों से तुलना करके परिभाषित किया गया है.
इस समझौते के अनुसार सैनिक ठिकाने वे हैं जो प्रकृति, स्थिति, उद्देश्य या इस्तेमाल की वजह से असरदार सैनिक उद्देश्य में सहायक बनें और जिनके विध्वंस, क़ब्ज़ा करने वग़ैरा से सैनिक उद्देश्यों की पूर्ति में सहायता मिलती हो.
लेकिन किसी भी क़ानूनी व्यवस्था की ही तरह इस समझौते के क़ानूनी पहलुओं में वाद-विवाद की गुंजाइश है. मसलन - क्या लेबनान के पुल और सड़कें हिज़बुल्ला के लिए आपूर्ति मार्ग हैं, जैसा कि इसराइल का कहना है. या फिर ये पुल और सड़कें ख़ालिस तौर पर असैनिक ढाँचे का हिस्सा हैं.
अंतरराष्ट्रीय क़ानून इस बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहता है कि इस तरह के ठिकानों को कभी भी निशाना नहीं बनाया जा सकता है.
लेकिन इस अतिरिक्त समझौते के अनुच्छेद 57 का कहना है कि सैन्य अभियान में लिप्त दोनों पक्षों के लिए यह ज़रूरी है कि वे इस बात की पूरी एहतियात बरतें कि आम लोगों पर इसका असर ना पड़े और हमले के लिए निशाने चुनते समय इस तरह के ठिकानें चुनें जिससे नागरिकों के लिए जान-माल का कम से कम नुक़सान हो.
इस समझौते का कहना है कि आम लोगों को हमले का निशाना बनाना इसकी शर्तों का उल्लंघन करने का गंभीर मामला हो सकता है और हिज़बुल्ला जो रॉकेटों के ज़रिए इसराइल में आम लोगों को निशाना बना रहा है, यह उसके दायरे में आ सकता है.