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बुधवार, 19 जुलाई, 2006 को 16:58 GMT तक के समाचार

निक चाइल्ड्स और जोनाथन मार्कस का विश्लेषण

इसराइली कार्रवाई पर उठते सवाल

इसराइल द्वारा अपने दो बंधक सैनिकों को छुड़ाने के लिए शुरू हुई कार्रवाई में अब तक 250 से ज़्यादा लेबनानी और लगभग 25 इसराइली नागरिकों की जान जा चुकी है.

इसराइल को हमला किए हुए एक सप्ताह का समय बीत चुका है लेकिन लगता है कि मामला खिंचता जा रहा है और दूसरी तरफ़ कूटनीति के ज़रिए किसी हल की उम्मीद भी मंद पड़ती जा रही है.

इसराइली सेना का लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई के बारे में ये कहना है कि उनके हवाई हमले दक्षिणी बेरुत के उन इलाकों में किए जा रहे हैं जो हिज़बुल्ला के गढ़ माने जाते हैं.

उनके अनुसार वे हमलों मे उन रास्तों को निशाना बना रहे है जो हिज़बुल्ला छापामारों के ठिकानों तक जाते हैं और जिनकी हथियारों और रसद आदि की आवाजाही के लिए बड़ी अहमियत है.

इसराइली जनरल ये भी कहते हैं कि हिज़बुल्ला संगठन की रॉकेट फैक्ट्रियाँ भी उनके निशाने पर हैं. कुल मिलाकर लक्ष्य है कि हिज़बुल्ला संगठन को निरस्त किया जाए.

लेकिन इसराइली जनरलों को अब इस बात का अहसास हो रहा है कि सेना की ये कार्रवाई हिज़बुल्ला का उतना नुक़सान नहीं कर पा रही और ज़्यादा नुक़सान आम लेबनानी जनता को हो रहा है.

और ऐसी स्थिति में जब हिज़बुल्ला पूरी ताक़त के साथ इसराइली हमले का मुकाबला कर रहा है, उसे देखकर ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या वाक़ई हवाई और ज़मीनी हमलों से इसराइल हिज़बुल्ला को नेस्तनाबूद कर पाएगा?

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि लेबनान की जनता को जिस तरह से इन हमलों की मार झेलनी पड़ रही है क्या उसे किसी भी तरह सही ठहराया जा सकता है?

हारी हुई कूटनीति

उधर लेबनान में इसराइल जितनी तेज़ी से सैनिक कार्रवाई किए जा रहा है, उसके ठीक उलट मामले को सुलझाने के लिए जारी कूटनीतिक प्रयासों की गति उतनी ही मंद है.

मध्य पूर्व भेजा गया संयुक्त राष्ट्र का कूटनीतिक मिशन नाक़ामयाब होकर वापस लौट चुका है.

यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख हाविय सोलाना संकट के हल की दिशा में कोई तरक्की नहीं कर पाए.

और अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ख़ुद कब मध्य पूर्व का रूख करेंगी ये कोई नहीं जानता.

उधर बुश प्रशासन ने इसराइली सेना को एक तरह से हरी झंडी देकर संतुष्ट हो गया है कि हिज़बुल्ला संगठन का जितना नुक़सान संभव हो सकता है वो कर डाले.

प्रस्ताव संख्या 1559

कूटनीतिज्ञ इस वक़्त ये सोचने में लगे हैं कि ऐसे कौन से क़ायदे क़ानून बनाए जाएँ जिनसे भविष्य में फिर इस तरह के संकट को टाला जा सके.

जहाँ तक इस दिशा में लेबनान में किसी तरह की कार्रवाई का सवाल है तो वहाँ सबसे महत्वपूर्ण ये माना जा रहा है कि वहाँ संयुक्त राष्ट्र की प्रस्ताव संख्या 1559 को पूरी तरह लागू कराया जाए.

फ़्रांस और अमरीका की संयुक्त कोशिश के बाद लाए गए इस प्रस्ताव के तहत लेबनान से सभी विदेशी सैनिकों को बाहर निकाला जाना था.

सीरिया पर अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ा जिसके बाद उसे लेबनान से अपने सैनिक वापस बुलाने पड़े.

लेकिन इससे प्रस्ताव का केवल एक हिस्सा पूरा हुआ. प्रस्ताव में ये भी कहा गया था कि लेबनान को अपनी सीमा में सक्रिय सभी चरमपंथी संगठनों पर लगाम लगानी होगी.

प्रस्ताव की ये बात लेबनान ने अभी तक पूरी नहीं की है. देश के दक्षिणी हिस्सों पर हिज़बुल्ला अभी तक सक्रिय है.

वर्तमान संकट के दौरान एक बार फिर प्रस्ताव 1559 को पूरी तरह पारित करवाने की बात कूटनीतिक के मंच पर ज़ोर-शोर से उठने लगी है.

लेकिन ये भी सत्य है कि इसे लागू करवा पाना आज की तारीख़ में भी उतनी ही बड़ी चुनौती है जितनी दो साल पहले थी.