मंगलवार, 18 जुलाई, 2006 को 11:36 GMT तक के समाचार
इसराइल पिछले कुछ सालों से लगातार ये मांग करता रहा है कि हिज़्बुल्ला अपने हथियार डाल दे.
संयुक्त राष्ट्र ने भी 2004 में हिज़्बुल्ला के निशस्त्रीकरण के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया.
अक्सर ये भी सवाल उठते हैं कि जब लेबनान की अपनी सेना है तो वो फिर हिज़्बुल्ला की सैनिक शाखा इस्लामिक रेसिस्टेंस पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगता.
लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या लेबनान की सरकार हिज़्बुल्ला पर लगाम कस नहीं सकती या कसना नहीं चाहती?
देखा जाए तो ये कहना ग़लत नहीं होगा कि दोनों ही बातें हैं. लेकिन सौ बात की एक बात यही है कि लेबनान की सरकार अपने दम पर बहुत कुछ नहीं कर सकती.
लेबनान में हिज़्बुल्ला समानान्तर सरकार की तरह है. उसकी सैनिक ताक़त लेबनान की राष्ट्रीय सेना से कहीं ज़्यादा है.
दबदबा
उसका राजनीतिक दबदबा ख़ासकर शिया मुसलमानों के बीच अच्छा-ख़ासा है और संगठन सामाजिक कार्यों में भी शामिल रहता है.
दक्षिणी लेबनान में क़ानून व्यवस्था के अलावा हिज़्बुल्ला ने स्कूलों, अस्पतालों और ऐसी कई सुविधाओं का एक ऐसा तंत्र स्थापित किया जिसके लिया वहाँ कि शिया समुदाय के लोग सालों से तरसते रहे हैं.
हिज़्बुल्ला की ताक़त इस बात से भी है कि लेबनान मध्यपूर्व में एक कमज़ोर देश माना जाता है. बल्कि उसे अल्पसंख्यकों का देश कहा जाता है और आधिकारिक रूप से वहाँ 14 समुदाय के लोग बसते हैं. इसलिए मध्यपूर्व की जटिल राजनीति में वे एकजुट ताक़त के रूप में नहीं नज़र आते.
ऐसे में इसराइल जैसे ताक़तवर देश के सामने खडा़ होने की कोई ताक़त रखता है तो वो है हिज़्बुल्ला. लेबनान की सरकार ये भली भांति जानती है.
साथ ही ये भी कहा जा सकता है कि सरकार के अंदर भी इस बात पर एकमत नहीं है कि हिज़्बुल्ला पर रोक लगाई जाए.
वहाँ की संसदीय व्यवस्था के तहत वहाँ राष्ट्रपति हमेशा मैरोनाइट इसाई समुदाय से होगा, प्रधानमंत्री सुन्नी समुदाय से होगा और स्पीकर या अध्यक्ष शिया समुदाय से होगा.
वर्तमान राष्ट्रपति एमिले लाहूद इसाई हैं लेकिन वो सीरिया के घोर समर्थक माने जाते हैं. वहीं प्रधानमंत्री फ़ुआद सिनियोरा सुन्नी हैं लेकिन उन्हें सीरिया विरोधी माना जाता है.
स्रोत
और सीरिया के ख़िलाफ़ एकमत नहीं होने का मतलब है हिज़्बुल्ला के ख़िलाफ़ एकमत नहीं होना क्योंकि हिज़्बुल्ला की ताक़त का एक प्रमुख स्रोत सीरिया है.
दरअसल ये भी कहा जा रहा है कि हिज़्बुल्ला ने इसराइली सैनिकों का अपहरण करके अपनी स्थिति और मज़बूत करने की कोशिश की है, लेबनान के भीतर और पूरे मध्यपूर्व में भी.
जब से सीरिया को लेबनान में हुए विरोध प्रदर्शनों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद से अपनी सेना वहाँ से हटानी पड़ी थी.
ये माना जा रहा है कि हिज़्बुल्ला कुछ कमज़ोर हुआ था. क्योंकि कमज़ोर सीरिया का मतलब था कमज़ोर हिज़्बुल्ला.
और अब हिज़्बुल्ला ने इसराइली ठिकानों पर दूर तक मार करके अपनी ताकत़ दिखाने की कोशिश की है. इस लड़ाई का आख़िरी परिणाम जो भी निकले, लेकिन फ़िलहाल हिज़्बुल्ला अरब जगत के मुसलमानों के बीच एक नायक बन गया है.