मंगलवार, 18 जुलाई, 2006 को 00:25 GMT तक के समाचार
राजेश प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता, लंदन
अब लंदन बैठे-बैठे लोग दिल्ली, अहमदाबाद, गोवा, मुंबई और बंगलौर जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर ज़मीन-जायदाद ख़रीद रहे हैं.
अचल संपत्ति है, वह तो नहीं आ सकती, ख़रीदने के लिए आपको ही भारत जाना होगा, इस सोच में कुछ तब्दीली दिख रही है.
अगर बिल्डर नामी है, लोकेशन ठीक है, दाम पसंद है, नक्शा ठीक लग रहा है तो बुकिंग कर दीजिए, बाद में जाकर देखते रहिएगा.
पिछले दिनों लंदन में मैं ऐसे ही प्रॉपर्टी शो में गया जहाँ ब्रोशर और वीडियो दिखाकर कंपनियाँ फ्लैट बेच रही थीं, 'अपने देश में अपना घर होना चाहिए' वाली भावुकता में भरकर नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट के लिए लोग फ्लैट ख़रीद रहे थे.
मैंने एक सेल्समैन से पूछा कि इन फ्लैटों में क्या सुविधाएँ हैं, जिस तरह रेस्तराँ के वेटर मेन्यू बताते हैं उन्होंने एक साँस में कहा, "जाकूज़ी, सॉना बाथ, स्विमिंग पूल, जिम, हेल्थ क्लब, पोर्टर सर्विस, सीसीटीवी कैमरा, अंडरग्राउंड पार्किंग, पावरबैकअप, लैंडस्केप गार्डन.... सर, लक्ज़री फ्लैट्स हैं."
अब पास खड़े एक एनआरआई सज्जन ने फ्लैट का दाम पूछा, जवाब मिला, 'जस्ट वन प्वाइंट फाइव, सर' यानी सिर्फ़ डेढ़ करोड़ रूपए, गुड़गाँव में तीन बेडरूम के लक्ज़री फ्लैट के लिए.
सज्जन पहले से ही कुछ चिढ़े हुए थे, दाम सुनकर और भड़क उठे, उन्होंने कहा, "और मैं बताता हूँ कि आपके फ्लैट में और क्या-क्या होगा, मक्खी, मच्छर, छिपकलियाँ, धूल, बिजली, पानी की किल्लत, गंदगी..."
इस पर सेल्समैन ने धीरे से मुस्कुरा कर कहा, "लगता है सर, आप बहुत साल से इंडिया नहीं गए हैं."
सेल्समैन शायद सही कह रहा था, मक्खी, मच्छर वग़ैरह सस्ते वाले भारत में पाए जाते हैं, वह तो डेढ़ करोड़ वाले इंडिया की बात कर रहा था.
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बाबाओं की महिमा
यह गलतफ़हमी किसी को भी हो सकती है कि तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका, गंडा-ताबीज़, काला जादू वग़ैरह सात समंदर पार छूट गया है और लंदन जैसे आधुनिक शहर में आकर भारतीय लोगों ने भी यूरोपीय तौर-तरीक़े अपना लिए होंगे.
अगर आप भारतीय फ़िल्मी पत्रिकाओं के ब्रितानी संस्करण को पलटेंगे तो आपकी यह गलतफ़हमी फौरन दूर हो जाएगी.
बाबा लोग तरह-तरह के चमत्कार कर सकते हैं. इन्हीं बाबा लोगों का एक चमत्कार यह भी है कि इन्हीं की बदौलत कई भारतीय फ़िल्मी पत्रिकाओं के संस्करण यहाँ बिक रहे हैं.
मैंने ऐसी ही एक फ़िल्मी पत्रिका में गिना, कुल 12 विज्ञापन थे जिनमें से नौ अलग-अलग बाबाओं के थे.
बेटे कहना नहीं मानते, अपनी पसंद से शादी नहीं हो रही, कारोबार में घाटा हो रहा है, मुक़दमे से परेशान हैं... तो फलाँ बाबा को फ़ोन करिए.
अजमेरी बाबा, बंगाली बाबा, उज्जैन के सिद्ध तांत्रिक, असम के कामाख्या मंदिर के साधक...ये सब लोग लंदन में जनकल्याण हेतु विराजमान हैं और हर समस्या का समाधान उनके पास है.
बाबा लोग पूरे पन्ने के विज्ञापन हर अंक में छपवा रहे हैं तो इसका मतलब यही है कि भले ही दूसरों को कारोबार में घाटा हो रहा हो, बाबा लोगों का कारोबार अच्छा चल रहा है.
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टॉयलेट में विज्ञापन
दिल्ली में जिन स्थानों को 'जनसुविधाएँ' कहा जाता है वहाँ ठीक आपकी आँख की ऊँचाई पर ढेर सारे छोटे-छोटे स्टिकर ज़रूर चिपके होते हैं, 'मैट्रिक फेल इंटर पास करें', 'पत्रकार बनें' या 'गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज'...
विज्ञापन करने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वह एक ऐसी जगह है जहाँ लोगों के क़ीमती वक़्त के कुछ लम्हे उनके हिस्से में ज़रूर आएँगे, जब तक कोई वहाँ खड़ा है इन विज्ञापनों के अलावा और कहाँ देख सकता है.
लंदन की कंपनियाँ विज्ञापन के इतने मामूली टोटके को न समझें, ऐसा तो हो ही नहीं सकता.
लंदन के वेम्बली स्टेडियम में सैकड़ों की तादाद में टॉयलेट बन रहे हैं लेकिन प्रायोजकों की आपसी खींचतान के बाद यही समझौता हुआ है कि स्टेडियम के टॉयलेटों में विज्ञापन नहीं होंगे.
लेकिन जब स्टेडियम के टॉयलेटों में लगाए जाने वाले कमोड और बेसिन की सप्लाई आई तो पता चला कि उन पर उसे बनाने वाली कंपनी का नाम मोटे अक्षरों में लिखा है, इसे भी विज्ञापन ही माना गया.
ढाई हज़ार से अधिक कमोडों और बेसिनों को वापस भेज दिया गया है और बिना नाम वाली सप्लाई का इंतज़ार किया जा रहा है.