http://www.bbcchindi.com

बग़दाद में बम हमले और गोलीबारी

इराक़ में शुक्रवार को विभिन्न घटनाओं में कम से कम 21 लोग मारे गए और कुछ अन्य घायल हो गए.

इनमें से 14 लोगों की मौत शिया और सुन्नी मस्जिदों पर हुए बम और मोर्टार हमलों में हुई है.

राजधानी बग़दाद और उत्तरी शहर बक़ूबा में कुछ सुन्नी नमाज़ियों को उस समय निशाना बनाकर बम हमला किया गया जब मस्जिद से जुमे की नमाज़ अदा करके निकल रहे थे..

इन हमलों में आठ लोग मारे गए.

सीरियाई सीमा के नज़दीक एक शिया मस्जिद पर भी बम हमला किया गया जिसमें कम से कम छह लोगों की मौत हो गई.

इससे पहले राजधानी बग़दाद में अमरीकी सैनिकों और इराक़ी पुलिस की एक शिया विद्रोही गुट के साथ मुठभेड़ हुई जिसमें कम से कम सात लोगों के मारे जाने की ख़बर है.

पुलिस के अनुसार शिया मौलवीर मुक़्तदा अल सद्र के वफ़ादार गुट मेहंदी सेना के लड़ाकों ने अमरीकी सैनिकों और पुलिस के साथ चार घंटे तक लड़ाई की. यह लड़ाई बग़दाद के पूर्वी सद्र सिटी इलाक़े में हुई.

इराक़ी अधिकारियों ने कहा है कि इस मुठभेड़ में तीस लोग घायल भी हुए.

अमरीका ने कहा है कि सुरक्षा बल एक ऐसे 'विद्रोही नेता' को पकड़ने के इरादे से छापे मारे गए थे जिस पर अनेक हमले करने का आरोप है.

मुक़्तदा सद्र के दफ़्तर में एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि सुरक्षा बलों के उस छापे का निशाना अबू देरा थे जो मेहंदी सेना में एक वरिष्ठ हस्ती हैं.

ख़बरों में कहा गया है कि यह छापा बग़दाद में रविवार को एक सुन्नी महिला सांसद को हुए अपहरण मामले से जुड़ा हो सकता है.

सुरक्षा बलों ने जैसे ही सद्र सिटी में पहुँचकर अपने निशाने की तरफ़ बढ़ना शुरू किया तभी वहाँ गोलीबारी शुरू हो गई.

सद्र सिटी बग़दाद का एक पूर्वी इलाक़ा है जहाँ शिया ज़्यादा संख्या में रहते हैं और ऐसा माना जाता है कि वहाँ वे चरमपंथी ज़्यादा संख्या में रहते हैं जो मुक़्तदा अल सद्र के समर्थक हैं.

इस खचाखच भरे इलाक़े में लगभग बीस लाख लोग रहते हैं.

अमरीकी सेना ने कहा है कि इस लड़ाई को दौरान कोई सैनिक या पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ है.

अमरीकी सैनिकों और पुलिस ने इस कार्रवाई में टैंकों, बख़्तरबंद वाहनों और हवाई जहाज़ों का सहारा लिया गया.

वर्ष 2003 में सद्दाम हुसैन का शासन समाप्त होने के बाद से मेहंदी सेना और अमरीकी सेनाओं के बीच अक्सर लड़ाई होती रहती है लेकिन वर्ष 2004 में सद्र सिटी और नजफ़ शहरों में गठबंधन सेनाओं के ख़िलाफ़ विद्रोह होने के बाद दोनों पक्ष अक्सर आमना-सामने करने से बचते रहे हैं.