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गुरुवार, 06 जुलाई, 2006 को 14:23 GMT तक के समाचार

पॉल फ़्रेंच
शंघाई से

क्यों है इतना अलग-थलग उत्तर कोरिया..?

उत्तर कोरिया एक ऐसा देश है जिसके गिने चुने ही दोस्त हैं. वो मदद के लिए उस तरह की गुहार भी नहीं लगा सकता है जैसे अफ़्रीकी देश या दक्षिण एशिया के देश लगाते हैं.

और इसलिए यदि उसे तेल और अनाज की ज़रूरत पूरी करनी होती है तो वो अपने परमाणु कार्यक्रम को मोलभाव का हथियार बनाता है.

उत्तर कोरिया 1953 में एक स्वतंत्र देश बना और स्टालिन के रूस की तरह एक कठोरता से नियंत्रित अर्थव्यव्सथा को अपनाया.

इस मॉडल में तेज़ी से औद्योगीकरण हुआ और पुनर्निमाण का भी काम हुआ लेकिन विकास को जारी नहीं रखा जा सका, लोगों का जीवन स्तर नहीं सुधरा.

अर्थव्यवस्था बैठने लगी और तब 2001 में चीन ने उत्तर कोरिया को अर्थव्यवस्था में सुधार की सलाह दी.

दरअसल चीनियों ने उत्तर कोरिया से एक तरह से ये कहा कि अब बदलने का समय है और चीन भी उत्तर कोरिया से चीनी सीमा की ओर भाग रहे शरणार्थियों से परेशान है.

आर्थिक सुधारों का ऐलान

वर्ष 2002 में उत्तर कोरिया ने कई आर्थिक सुधारों की घोषणा की, मूल्य नीति में बदलाव किया, राशन व्यवस्था ख़त्म की.

कीमतें आसमान छूने लगीं, चावल की कीमत में पचपन हज़ार प्रतिशत की वृद्धि हुई, मक्का पाँच हज़ार प्रतिशत तेज़ हुआ, बिजली में 143 प्रतिशत की तेज़ी आई और लोगों के वेतन में केवल 1800 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

सरकार की सोच थी कि यदि मुद्रास्फ़ीति को नियंत्रण में रखा गया तो अर्थव्यव्स्था में एक नई तेज़ी आएगी.

संसाधनों का अभाव

लेकिन इस नीति के पीछे सोच ये थी कि देश में ऐसे संसाधनों की भरमार है जिनका ठीक तरह से इस्तेमाल नहीं हो रहा. लेकिन 25 सालों से तंगी का माहौल था उससे संसाधनों की कमी हो चुकी थी.

बाज़ार में सामान पहुँचने लगे, लेकिन उन्हें ख़रीदने के लिए लोगों के पास पैसा नहीं था.

और ज़्यादातर उत्तर कोरियाई लोगों के लिए सुधार का परिणाम हुआ और ग़रीबी.

और जब सुधार कार्यक्रम नहीं चला तो 2002 में उत्तर कोरिया ने कथित रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम को शुरू करने की घोषणा की. जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मोलभाव के एक हथियार के रूप में देखा और बातचीत के लिए छह देशों के गुट का गठन हुआ.

लेकिन इस घटना से यही लग रहा है कि कूटनीति विफल हो रही है क्योंकि उत्तर कोरिया के पास आर्थिक सुधार का कोई रास्ता नहीं है और उसे लगातार अनुदान की ज़रूरत है.

और यदि ये देश इसी तरह अलग थलग रहा तो शायद इस बूंद बूंद अनुदान से ये ज़िंदा भी रह सके लेकिन वर्तमान सत्ता भी इस तरह के मोलभाव से चलती रहेगी लेकिन वहां के एक आम नागरिक की ज़िदगी बदल सकेगी ये आसार कम ही है.