गुरुवार, 06 जुलाई, 2006 को 17:57 GMT तक के समाचार
वंदना विजय
बीबीसी संवाददाता, लंदन
सात जुलाई 2005 को मैं रात्रि शिफ़्ट से घर लौटकर गहरी नींद में सो रही थी.
सुबह-सुबह मोबाइल फ़ोन बजा. फो़न भारत से था सो जैसे-तैसे उठाया.
दूसरे छोर पर मेरी बहन थी.
आवाज़ बिल्कुल घबराई हुई. बार-बार यही पूछ रही थी क्या मैं सुरक्षित हूँ?
मैने मुश्किल से दो घंटे की नींद पूरी की थी...
सो उस समय बेतुका सा लगने वाला ये सवाल सुनकर कुछ झल्ला गई.
मैने थोड़ा चिढ़ कर पूछा क्या हो गया, कहीं बम फट गया है क्या?
जबाव आया हाँ, चार धमाके हुए हैं, लंदन में.......
दूसरे छोर से हेलो हेलो होता रहा, पर मेरी ओर से कोई जबाव नहीं निकल सका, सारे शब्द कुछ देर के लिए जैसे गुम हो गए थे कहीं.
बस उसके बाद तो नींद रफ़ू चक्कर हो गई और तुरंत जानने की कोशिश की कि आख़िर हुआ क्या है.
दुनिया भी कितनी छोटी हो गई है. किसी भी हिस्से में कुछ भी हो, पूरी दुनिया को मिनटों में पता लग जाता है.