गुरुवार, 06 जुलाई, 2006 को 17:45 GMT तक के समाचार
महबूब ख़ान
बीबीसी संवाददाता, लंदन
मैं उस दिन रात्रि शिफ़्ट ख़त्म करके सुबह छह बजे दफ़्तर से घर गया था और दफ़्तर में ही किसी ज़रूरी मीटिंग के लिए दिन में फिर बारह-एक बजे आना था.
मोबाइल फ़ोन बंद था. ग्यारह बजे आँख खुल गई तो जल्दी से दफ़्तर की तरफ़ चल दिया.
इतना वक़्त नहीं मिला कि रेडियो या टेलीविज़न पर ताज़ा समाचार जान पाता.
दफ़्तर जाने के लिए भूमिगत रेल ही इस्तेमाल करता हूँ इसलिए क्वींसबरी स्टेशन पहुँचा तो देखा कि जुबली लाइन रद्द कर दी गई थी.
वहाँ काफ़ी भीड़ जमा थी. समझ में कुछ नहीं आया.
एक रेलकर्मी से पूछा कि मुझे सेंट्रल लंदन जाना है तो वह नाराज़ होते हुए कहने लगा, आख़िर आपको सेंट्रल लंदन जाने की ज़रूरत क्या है?
मैंने कहा कि मुझे अपने कार्यस्थल पहुँचना है...
तो उसने तब भी ज़्यादा कुछ बताए बिना यही कहा कि क्या आपको अपनी ज़िंदगी प्यारी नहीं है.
मैं चौंका कि आख़िर यह आदमी ऐसी बात क्यों कह रहा है.
भीड़ तो काफ़ी इकट्ठी थी मगर लोगों में कोई तनाव या ग़ुस्सा नहीं था.
फिर वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने बताया कि सेंट्रल लंदन में बम धमाके हुए हैं और तमाम परिवहन व्यवस्था रद्द करके सरकार ने अगले आदेशों तक सभी को "जो जहाँ है वहीं रहने" की सलाह दी है.
लोगों का धैर्य देखकर अचरज हुआ कि इतनी बड़ी समस्या होने पर भी कोई भगदड़ या रेल प्रशासन पर कोई नाराज़गी नहीं.
सभी इस जुगाड़ में थे कि किसी तरह जल्दी से सुरक्षित घर पहुँचा जाए. यहाँ लोगों में यह ख़ासियत ज़रूर देखने को मिली कि समस्या या परेशानी कितनी ही बड़ी क्यों ना हो, लोग घबराते नहीं हैं और धैर्य रखते हुए रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं.
मैंने ऑललाइन संपादक सलमा ज़ैदी को इस बारे में बताने के लिए मोबाइल फ़ोन जेब से निकाला तो उसमें पहले से ही उनका संदेश था कि बम धमाके होने की वजह से स्थिति बहुत नाज़ुक है और घर से नहीं निकलें.
बस मैं घर के लिए दौड़ पड़ा.