गुरुवार, 06 जुलाई, 2006 को 18:03 GMT तक के समाचार
इंदुशेखर सिन्हा
बीबीसी संवाददाता, लंदन
सात जुलाई, 2005 की सुबह - हर रोज़ की तरह मैं दफ्तर आ रहा था.
यहाँ ट्यूब (ट्रेन) में किसी से गप लड़ाना तो दूर, नज़रें मिलाना भी बदसलूकी मानी जाती है....
सो अपने अख़बार का पन्ना पलटते, कॉफी की चुस्कियां लेते मैं चला आ रहा था. तभी ट्यूब रुक गई.
किसी ज़माने में हमेशा समय पर चलने वाली इन गाड़ियों के लिए अब ये कोई नई बात तो थी नहीं लेकिन इस बार प्रशासन को कोसने का एक नया कारण (बहाना !!) ज़रूर था.
पास वाले ने बुदबुदाते हुए कहा, "अगर यही हाल रहा, तो ओलेम्पिक की क्या ख़ाक मेज़बानी करेंगे."
बताया गया कि बिजली की समस्या की वजह से ट्यूब अगले स्टेशन के आगे नहीं जाएगी. बस पर सवार हो मैं सेंन्ट्रल लंदन (दफ्तर) की और बढा.
आसपास सायरन बजाती पुलिस की गाड़ियाँ हर दिशा में दौड़ती हुईं नज़र आईं. माथा ज़रूर ठनका.
यूँ तो लंदन में कोई भी दिन, पुलिस या एम्बुलेंस का सायरन सुने बिना नहीं बीतता, लेकिन उस दिन मामला गंभीर लगा.
दफ्तर फोन घुमाया तो सभी लाइनों को व्यस्त पाया.
रास्ते पर जाम लगने लगा और जिस बस पर मैं सवार था उसकी गति को देखते हुए मैने पैदल ही आगे चलने का फैसला किया.
मैं एजवेयर रोड के ट्यूब स्टेशन के बहुत क़रीब था. उसे पुलिस वालों से घिरा देख पत्रकार मन में सवाल दौड़ने लगे.
एक पुलिस वाले ने बताया कि नीचे ट्यूब में धमाका हुआ है. मैं फौरन पास के सेंट मेरीज़ अस्पताल जा पहुँचा.
वहाँ अफरातफरी मची हुई थी.
कुछ ही मिनटों में एक और धमाके की जानकारी मिली. न्यूयोर्क से लौटे मुझे अभी एक महीना भी नहीं हुआ था.
वहाँ के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ध्वस्त इमारत का दृश्य आँखों के आगे घूमने लगा. यहाँ लंदन में भी वैसा कुछ न दिखे...
बस इसी प्रार्थना के साथ मैं लंबे-लंबे क़दमों के साथ दफ्तर की ओर बढ़ने लगा.