सोमवार, 03 जुलाई, 2006 को 15:08 GMT तक के समाचार
महबूब ख़ान
बीबीसी संवाददाता, लंदन
पिछले दिनों लंदन में एक पुरस्कार समारोह में जाने का मौक़ा मिला. पुरस्कार समारोह का संचालन शुरू हुआ तो मुख्य अतिथि की कुर्सी ख़ाली थी.
बताया गया था कि मुख्य अतिथि ब्रिटेन के सांसद और गृहमंत्रालय में एक मंत्री (राज्यमंत्री) टोनी मैकनल्टी हैं.
इत्तेफ़ाक से टोनी मैकनल्टी ग्रेटर लंदन के हैरो इलाक़े से सांसद हैं जहाँ मैं भी रहता हूँ. इसलिए मैं उन्हें पहचानता हूँ.
कुछ ही मिनटों बाद देखा कि टोनी चुपके से आकर खड़े हो गए. हाथ में काग़ज़ों से भरी मोटी फ़ाइल. सूट पहने हुए लेकिन चेहरे पर दिन भर के कामकाज की थकान झलक रही थी.
लोगों को लगा कि मुख्य अतिथि यानी मंत्री जी के साथ सचिवों, सहायकों और सुरक्षा कर्मियों का अमला होगा लेकिन देखा तो सिर्फ़ एक अदद शख़्सियत के साथ मंत्री जी मुस्कुराते हुए मंच की तरफ़ बढ़ गए.
इसके उलट भारत में जनप्रतिनिधियों में दिखावे, ठाठबाठ और ख़तरे के नाम पर भारी-भरकम ख़र्च करके आम लोगों पर रौब जमाने की होड़ न जाने कब ख़त्म होगी?
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'पिछड़ेपन' की निशानी
मेरी बिटिया के स्कूल की तरफ़ से हाल ही में अभिभावकों के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें यह बताने पर ज़्यादा ज़ोर था कि सभी को अपनी भाषा और संस्कृति अपने बच्चों को सिखाने पर ख़ास ध्यान देना चाहिए ताकि बच्चे अपनी जड़ों से दूर न हों.
अभिभावकों में विभिन्न भाषा, संस्कृति और पृष्ठभूमि से आए हुए लोग थे. उनके बच्चे विभिन्न स्कूलों में पढ़ते हैं.
भारतीय मूल/पृष्ठभूमि की एक महिला ने कहा कि उन्हें हिंदी बोलना अच्छा लगता है और हिंदी फ़िल्में बहुत ही पसंद हैं.
मगर उनके पति और सास-ससुर इस पर बहुत ऐतराज़ करते हैं, किसी सार्वजनिक स्थान पर अगर वो हिंदी बोलने की कोशिश करती हैं तो वे झिड़क देते हैं और कहते हैं कि लोग क्या समझेंगे.
कार्यक्रम के आयोजकों को यह बड़ा अटपटा लगा. उन्होंने सवाल उठाया कि कोई इंसान अपनी भाषा या संस्कृति के आधार पर बैकवर्ड कैसे हो सकता है?
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मेड इन इंडिया
हम जब भी भारत जाते हैं तो परिजन, संबंधी और दोस्त सभी को उम्मीद होती है कि हम इंग्लैंड से उनके लिए भी कुछ ख़ास तोहफ़ा लेकर जाएँ.
इस साल भारत के दौरे में हालाँकि अभी काफ़ी देर है लेकिन सोचा कि आहिस्ता-आहिस्ता चीज़ें ख़रीदकर रख लेंगे तो क्वालिटी भी मिल जाती है और वैरायटी भी.
इसी सिलसिले में हम हाल ही में कुछ ख़रीदारी कर रहे थे तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि आख़िर क्या-क्या चीज़ें ख़रीदें क्योंकि भारत में भी काफ़ी कुछ मिलता है.
पहले इम्पोर्टेड चीज़ की जो साख थी वो अब ख़त्म हो चली है क्योंकि यूरोप का ज़्यादातर माल भारत में उपलब्ध है.
बहरहाल हम एक स्टोर में गए तो कुछ क़मीज़ें और पतलूनें पसंद आईं मगर हमने क़मीजों का चयन किया.
उसका कॉलर, डिज़ायन, सिलाई और रंग वग़ैरह सभी आकर्षक थे और सेल्समैन ने बताया कि यह 100 प्रतिशत कॉटन की शर्ट हैं.
हमने कुछ क़मीज़ें ख़रीद लीं लेकिन घर आकर उन्हें ग़ौर से देखा तो दंग रह गए. समझ में नहीं आया कि इन क़मीज़ों को वापस करने जाएँ या फिर कमीज़ों पर लगे उन बिल्लों को फाड़ दें जिन पर लिखा था – ‘मेड इन इंडिया’.
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किसकी ज़िम्मेदारी?
हाल ही में ऐसा हुआ कि हमें किसी कारण से अपने घर से बस थोड़ी ही दूर जाना था. हमने कार निकाली, पास ही जाना था इसलिए हमने सोचा कि सीटबेल्ट क्या लगाएँ.
लेकिन मैंने जैसे ही कार स्टार्ट की, हमारा तीन साल का बेटा बोल पड़ा कि उसकी बेल्ट लगाना भूल गए हैं.
हमने काफ़ी समझाने की कोशिश की मगर उसने साफ़ इनकार कर दिया कि सीट बेल्ट लगाए बिना नहीं चलना चाहिए और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा. ऐसा उसने टेलीविज़न से सीखा है.
मुझे वो वाक़या याद आ गया जब पिछली बार हम भारत में अपने परिजनों से मिलने गए थे. हवाई अड्डे से हम जिस वाहन में चले इसमें हम तीन पीढ़ियों के लोग बैठे थे.
थोड़ी ही दूर चलने पर अंदाज़ा हो गया कि ड्राइवर कितना लापरवाह है. वह दनादन लाल बत्तियों का उल्लंघन करते हुए बेक़ाबू स्पीड से चला जा रहा था.
मैंने उसे टोका तो कहने लगा कि डरिए मत साहब, सुबह अमरोहा से दिल्ली आते हुए भी हम एक भी लाल बत्ती पर नहीं रुके थे इसलिए रिकॉर्ड टाइम में यहाँ पहुँच गए थे.
उसे समझाने की कोशिश की तो उसे लगा कि हम उसके ड्राइविंग हुनर की बेक़द्री कर रहे हैं.
यक़ीन मानिए कि रास्ते भर हम चैन से नहीं बैठ सके. घर सुरक्षित पहुँचने पर ख़ुदा का शुक्र अदा किया और उस ड्राइवर की गाड़ी आगे से कभी भी इस्तेमाल नहीं करने की क़सम भी खाई.
(हमारी साप्ताहिक लंदन डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).