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गुरुवार, 15 जून, 2006 को 03:05 GMT तक के समाचार

'दारफ़ुर में सामूहिक हत्याओं के सबूत'

अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के एक जाँचकर्ता का कहना है कि उन्होंने सूडान के दारफ़ुर इलाक़े में हज़ारों नागरिकों की हत्या के सबूत इकट्ठे किए हैं.

मानवता के ख़िलाफ़ अपराध के आरोपों की जाँच कर रहे लुइस मारेनो ओकैंपो ने कहा है कि इनमें बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएँ और बलात्कार की सैकड़ों घटनाएँ शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र को दी गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने उस जाँच की निंदा की है जो सूडान ने ख़ुद की थी.

इस रिपोर्ट को महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यदि ये पाया गया कि सूडान ने पीड़ितों को न्याय नहीं दिया तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है.

इस रिपोर्ट के विवरण देते हुए लुइस मारेनो ओकैंपो ने बीबीसी से कहा कि उनका जाँच दल दारफ़ुर से बाहर काम कर रहा था लेकिन उनके काम में 'गंभीर बाधाएँ' पहुँचाई गईं.

उनका कहना था, "अब हम जाँच के नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं और अब हमें पूरी तरह सहयोग की ज़रुरत होगी ताकि हम जाँच पूरी कर सकें और उन लोगों की पहचान कर सकें जिन्होंने दारफ़ुर में अपराध किए."

सामूहिक हत्याएँ

दारफ़ुर की इस अपराध सूची में न्यायालय के जाँचकर्ताओं ने हत्या के हज़ारों आरोपों की सूची बनाई है जिसमें ऐसी कई सामूहिक हत्याएँ शामिल हैं जिसमें सैकड़ों लोगों को एक साथ मार दिया गया था.

जाँचकर्ताओं के अनुसार प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हत्यारों ने कहा कि वे सभी को इस ज़मीन से ही हटा देंगे.

लुइस मारेनो ओकैंपो की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा की वजह से कोई बीस लाख लोगों को दारफ़ुर इलाक़े से विस्थापित होना पड़ा.

उनका कहना है कि वर्ष 2006 के शुरुआती कुछ महीनों में लोगों को घर-बार छोड़कर भागने के लिए ज़्यादा बाध्य किया गया.

लुइस मारेनो ओकैंपो का कहना है कि ऐसा लगता है कि सूडान सरकार इन घटनाओं की जाँच नहीं कर रही है.

उनका कहना है कि सूडान की सरकार इस मामले में कुछ सरकारी अधिकारियों से पूछताछ के लिए राज़ी हो गई है जो इस साल अगस्त से शुरु होगी.

विवाद

सूडान के पश्चिमी भाग में स्थित इलाक़े दारफ़ुर में पिछले तीन सालों के विवाद में, माना जाता है, कोई दो लाख लोग मारे गए हैं.

इनमें से ज़्यादातर लोग, सरकार समर्थित लड़ाकों के नागरिकों पर किए गए हमलों की वजह से मारे गए हैं.

फ़रवरी 2003 में विद्रोही गुट ने हथियार उठा लिए थे.

विद्रोहियों का आरोप है कि सरकार अरबों की तुलना में अफ़्रीकी अश्वेतों की उपेक्षा कर रही है.

इस साल मई में एक समझौता ज़रुर हुआ था लेकिन उससे सभी पक्ष सहमत नहीं थे और इससे स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ गई.