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काट्या एडलर
बीबीसी संवाददाता, रामल्ला

'अब्बास-हमास के बीच टकराव'

फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास की फ़लस्तीनी राष्ट्र के मुद्दे पर 26 जुलाई को जनमत संग्रह कराने की घोषणा से फ़लस्तीनी राष्ट्रपति और हमास के नेतृत्व वाली सरकार के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती जा रही है.

हमास ने कहा है कि वह सोमवार को संसद का आपात सत्र बुलाएगा ताकि जनमत संग्रह की वैधता के बारे में विचार किया जाए. दूसरी ओर उसने अपने समर्थकों से इसका बहिष्कार करने का आह्वान किया है.

कुछ समय पहले महमूद अब्बास ने कहा था कि वो फ़लस्तीनियों से ही पूछना चाहते हैं कि क्या वह इसराइली-फ़लस्तीनी संघर्ष को हल करने के लिए दो राष्ट्रों के सह-अस्तित्व को स्वीकार करते है?

महमूद अब्बास हमास पर दबाव डालना चाहते हैं कि वह उनकी फ़तह पार्टी के साथ साझा नीतियां तय करे.

'राष्ट्रपति का विद्रोह'

उनका कहना था, "मैं अपने सभी फ़लस्तीनी भाइयों से कहता हूँ कि अगर हमास के साथ कल या आज कोई सहमति हो जाती है तो मामला सुलझ जाएगा. इसमें अगर एक सप्ताह या एक महीना भी लगे तो कोई बात नहीं. अगर जनमत संग्रह के एक दिन पहले भी किसी तरह की सहमति हो जाती है तो संकट हल हो जाएगा."

महमूद अब्बास का कहना है कि पश्चिमी तट, ग़ज़ा पट्टी और पूर्वी येरुशलम को मिलाकर एक स्वतन्त्र फ़लस्तीनी राष्ट्र का निर्माण होना चाहिए.

उधर हमास की सरकार इससे सहमत नहीं है. उसका कहना है कि पूरा इसराइल फ़लस्तीनी ज़मीन पर बना है.

यहाँ तक कि हमास ने तो जनमत संग्रह कराने की महमूद अब्बास की घोषणा को उसकी सरकार के ख़िलाफ़ खुले विद्रोह की संज्ञा दी है.

हमास के एक सांसद मुशीर अल मस्री का कहना था, "यह सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह की घोषणा है. जिसने भी जनमत संग्रह कराने की घोषणा की है उसे इसके गंभीर परिणामों की भी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी."

हमास का कहना है कि यह जनमत संग्रह फ़लस्तीनी जनता को संगठित करने की बजाय और विभाजित करेगा.