सोमवार, 29 मई, 2006 को 13:30 GMT तक के समाचार
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इंडोनेशिया के जावा द्वीप में शनिवार को आए विनाशकारी भूकंप के बाद राहत कार्यों में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
भूकंप प्रभावित प्रांतों के गवर्नरों का कहना है कि क़रीब 4300 लोग मारे गए हैं. लेकिन अन्य अधिकारियों ने मरने वालों की संख्या क़रीब पाँच हज़ार बताई है. 20 हज़ार लोग घायल हैं.
प्रभावित इलाक़ों में राहतकर्मियों के आने का सिलसिला जारी है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष राहत अधिकारी यान एगलैंड ने बीबीसी को बताया है कि आने वाले समय में और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुशीलो बम्बांग युधोयोनो ने कहा है कि राहत सामग्री वितरण के काम में तेज़ी लानी पड़ेगी. उन्होंने प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया. उन्होंने कहा कि देश में तीन महीने के लिए आपातकाल लगा दिया गया है.
भूकंप के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए हैं. प्रभावित इलाक़ों में चिकित्सा संसाधनों की तुरंत आवश्यकता है. इंडोनेशिया के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें चिकित्सा दलों की ज़रूरत है.
रविवार को हज़ारों लोगों ने लगातार दूसरी रात खुले में बिताई. अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित लोगों के लिए टेंट और खाने के सामान की भी आवश्यकता है.
प्रभावित इलाक़ों में बचाव कार्य भी चल रहा है. लेकिन राहतकर्मियों का आकलन है कि अब वे शायद ही किसी को जीवित बचा पाएँ.
बैठक
इस बीच संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसियाँ स्थिति का आकलन करने के लिए जिनेवा में बैठक कर रही हैं.
जावा द्वीप के सबसे प्रभावित शहर योग्यकर्ता के निकट ही माउंट मेरापी ज्वालामुखी है. जिसके इसी महीने फटने की आशंका व्यक्त की जा रही थी.
हालाँकि हज़ारों लोगों को इलाक़े से सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इलाक़े में आए भूकंप के बाद इस ज्वालामुखी में गतिविधियाँ कुछ बढ़ गई हैं.
योग्यकर्ता से बीबीसी संवाददाता राचैल हार्वी का कहना है कि ज्वालामुखी फटने की स्थिति से निपटने के लिए की गई आपात तैयारी अब भूकंप प्रभावित इलाक़ों में लगाई जा रही है.
भूकंप से प्रभावित योग्यकर्ता में स्थिति काफ़ी दयनीय है. क़रीब दो लाख लोग बेघर हैं. खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर लोग मौसम की मार भी झेल रहे हैं.
अस्पताल घायलों से भरे पड़े हैं. भूकंप के बाद तीसरे दिन भी कई लोग गंभीर स्थिति में है. चिकित्सा संसाधनों में कमी के बावजूद ऐसे लोगों को बचाने की कोशिश जारी है.