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सोमवार, 20 फ़रवरी, 2006 को 17:28 GMT तक के समाचार

परमाणु शोध कार्यक्रम जारी रहेगा: ईरान

ईरान ने कहा है कि रूस के साथ हो रही बातचीत का नतीजा कुछ भी हो, वह अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा.

रूस की राजधानी मॉस्को में ईरान और रूसी अधिकारियों के बीच हुई पहले दौर की बातचीत के बाद ईरान की ओर से यह बयान आया है.

रूस ने ईरान के सामने ये प्रस्ताव रखा है कि वह यूरेनियम संवर्धन का काम निगरानी में उसके परमाणु केंद्र पर कर सकता है.

इस प्रस्ताव को अमरीका और यूरोपीय संघ का भी समर्थन हासिल है. अमरीका और यूरोपीय संघ को शक है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित कर रहा है.

रूस के विदेश मंत्री सर्जेई लवरोफ़ ने कहा है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए उनका देश हरसंभव कोशिश करेगा.

इस बीच ब्रसेल्स के दौरे पर गए ईरान के विदेश मंत्री मनूचेर मोतक्की ने कहा है कि ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की अनुमति मिलनी चाहिए. ईरान इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि उसका परमाणु कार्य बिजली उत्पादन के लिए है.

मोतक्की ने कहा है कि उनका देश रूस की परमाणु भट्टी में ईरान के लिए यूरेनियम से ईंधन बनाने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है.

लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान के पास शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु तकनीक विकसित करने का अधिकार रहेगा.

आलोचना

ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि परमाणु हथियार बनाना ईरान के प्रतिरक्षा कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है. उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम संबंधी विवाद को सुरक्षा परिषद को सौंपने के फ़ैसले की निंदा की.

वहीं यूरोपीय संघ ने कहा है कि वो ईरान को कूटनीतिक तबके में अलग-थलग नहीं करना चाहता और मसले का कूटनीतिक हल निकालना चाहता है.

ब्रसेल्स से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हाल में ईरान और यूरोपीय संघ के बीच जो कड़वाहट पैदा हुई है वो केवल उसके परमाणु कार्यक्रम की वजह से नहीं.

उनका कहना है कि ईरान के राष्ट्रपति ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के जनसंहार की वास्तविकता पर सवाल उठाया था और पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान ईरान में यूरोपीय दूतावासों को क्षति पहुँचाई गई, जो कड़वाहट का कारण हो सकती है.

ईरान के विदेश मंत्री मोतक्की ने कहा कि दोनो पक्षों को एक-दूसरे की भावनाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर करना चाहिए.

हालांकि उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों के जनसंहार की वास्तविकता को तो चुनौती नहीं दी लेकिन इस बात पर ज़रूर सवाल किए कि क्या उसमें वाक़ई साठ लाख यहूदी मारे गए थे.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह अपराध यूरोप में हुआ था तो इसकी क़ीमत मुसलमानों की जेब से क्यों चुकाई जाए.