यूरोपीय सांसदों ने यूरोप और मुस्लिम देशों में पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों के विरोध में हो रहे हिंसक प्रदर्शनों की आलोचना की है.
ये कार्टून सबसे पहले डेनमार्क में छपे थे और यूरोपीय सांसदों का कहना है कि डेनमार्क या यूरोप के किसी भी देश के ख़िलाफ़ कोई भी हमला यूरोप पर हमले की तरह देखा जाएगा.
लेकिन इस बहस में हिस्सा लेने वाले सांसदों ने ये भी कहा कि प्रेस की आज़ादी की भी सीमाएँ हैं और प्रेस को और ज़्यादा ज़िम्मेदाराना तरीके से काम करना चाहिए.
फ़्राँस के स्ट्रॉसबुर्ग़ शहर में बीबीसी संवाददाता एलेक्स क्रूगर का कहना है कि इस बहस में यूरोपीय संघ के सदस्यों या यूरो सांसदों ने इस मुद्दे पर भी बात की कि पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों से क्या पश्चिमी दुनिया और मुस्लिम सभ्यताओं के बीच एक तरह का युद्ध शुरू हो गया है लेकिन अधिकतर सांसदों का मानना था कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है.
यूरो सांसदों ने कहा कि इस संकट से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है आपसी बातचीत, एक दूसरे के प्रति सम्मान और एक दूसरे की भावनाओं को समझना.
यूरोपीय संघ की संसद का एक बड़े हिस्सा हैं मध्य वामपंथी जो उदारवादी विचार रखते हैं. इनकी ओर से डेनमार्क से यूरो सांसद पोउल निरूप रासम्युसेन ने कहा कि यूरोप ने कई संघर्षों के बाद सीखा है कि किस तरह से आपसी सदभाव के साथ रहना ही जीने का बेहतर तरीका है.
रासम्युसेन का कहना था कि हम स्पष्ट तौर पर बता देना चाहते हैं कि ये हमारी और उनकी लड़ाई नहीं है, बात साथ-साथ रहने की है लेकिन साथ ही उन्होंने इस्लामी अतिवादियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे लोगों ने कार्टून का मामला भावनाएँ भड़काने और हिंसा फैलाने के लिए किया जो ग़लत है.
ग़ौरतलब है कि फ़लस्तीनी इलाक़ों में पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों के विरोध में जो हिंसक प्रदर्शन हुए थे उनका निशाना यूरोपीय संघ के दफ़्तर भी बने थे.
यूरोपीय संघ की संसद के मध्य दक्षिणपंथी धड़े के एक सांसद हांस गर्ट पॉटरिंग का कहना था कि सभ्यताओं के बीच संवाद बढ़ाना काफ़ी नहीं है, उनका कहना था कि यूरोपीय संघ को और कड़े क़दम उठाने की ज़रूरत है.
हांस गर्ट पॉटरिंग का कहना था कि ये हिंसक विरोध ख़ुद शुरू नहीं हुआ, इन्हें कुछ देशों की ऐसी सरकारों का भी समर्थन हासिल था जो ख़ुद बोलने की आज़ादी में विश्वास नहीं रखतीं.
यूरोपीय आयोग के प्रमुख होज़े मैन्युएल बरोसो ने कहा कि डेनमार्क के सामान का बायकॉट करना यूरोप के सामान का बायकॉट करने के बराबर है और ऐसी प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ अच्छे मूल्यों पर आधारित व्यवहार प्रचलन में लाने की ज़रूरत है.