सोमवार, 30 जनवरी, 2006 को 14:23 GMT तक के समाचार
अरब देशों में लोगों में एक ऐसे कार्टून पर ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है जिसे इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद का बताया गया है.
यह कार्टून डेनमार्क के एक अख़बार में ज्यूलैंड पोस्ट में पिछले साल प्रकाशित किया गया था जिसमें पर मुसलमानों ने ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहा गया है कि उनके मज़हब का मज़ाक उड़ाया गया है.
उसके बाद से यह कार्टून नॉर्वे में भी छापे जाते रहे हैं. ग़ौरतलब है कि इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद का कोई फोटो या उनके चेहरे की नक़ल उतारकर छापने की इजाज़त नहीं है.
बीबीसी संवाददाता जूलिया व्हीलर का कहना है कि उस कार्टून में पैगंबर मोहम्मद को एक 'आतंकवादी' दिखाया गया है इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इससे मुसलमानों में ग़ुस्सा फैलेगा.
मुसलमानों का कहना है कि यह उनका कर्तव्य है कि वह अपने पैगंबर की प्रतिष्ठा की हिफ़ाज़त करें.
इससे पहले भी खाड़ी देशों में मुसलमान अमरीकी नीतियों के विरोध में अमरीकी सामान का बहिष्कार करते रहे हैं लेकिन अब उनका ध्यान डेनमार्क के उत्पादों की तरफ़ चला गया है.
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में कुछ सुपरस्टोर डेनमार्क के उत्पादों को अपने यहाँ से हटा रहे हैं.
संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी समाचार एजेंसी ने देश के इस्लामी मामलों के मंत्री के हवाले से कहा है कि ये कार्टून "वाहियात और ग़ैरज़िम्मेदार" हैं.
मंत्री ने इन कार्टूनों को "सांस्कृतिक आतंकवाद बताते हुए कहा है यह अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है."
खाड़ी देशों के एक प्रमुख अख़बार ने डेनमार्क के उत्पादों का बहिष्कार करने के मुद्दे पर जनमतसंग्रह कराया और अख़बार का कहना है कि जनमतसंग्रह में भाग लेने वालों में से 73 प्रतिशत ने बहिष्कार का समर्थन किया है.
अख़बार ने अंदर के पन्नों पर कुछ तस्वीरें छापी हैं जिनमें दुबई में कुछ महिलाओं और बच्चों को प्रदर्शन करते हुए दिखाया गया है.
खाड़ी देशों में मुसलमानों का कहना है कि वह कार्टून से ख़ुद को असम्मानित महसूस कर रहे हैं और वह समझते कि इससे सांस्कृतिक समझ को बढ़ाने में कोई मदद नहीं मिलती.
अरब देशों में वैसे तो अनेक मुद्दों पर अक्सर मतभेद नज़र आते हैं लेकिन यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर लोगों में एकजुटता नज़र आती है.