गुरुवार, 29 दिसंबर, 2005 को 05:41 GMT तक के समाचार
इंडोनेशिया की सरकार ने आचे प्रांत से सैनिकों को पूरी तरह हटा लिया है. गुरुवार को एक समारोह के बाद सैनिकों की आख़िरी टुकड़ी भी हटा ली गई.
इंडोनेशियाई सरकार ने 26 साल पहले आचे में शुरू हुए अलगाववादी आंदोलन को दबाने के लिए वहाँ सैनिक भेजे थे. आचे से सैनिकों की वापसी विद्रोही संगठन फ़्री आचे मूवमेंट और सरकार के बीच समझौते के बाद संभव हो पाई है.
26 साल तक चले इस संघर्ष में 15 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. सैनिकों की आख़िरी टुकड़ी की वापसी के मौक़े पर हुए एक समारोह में स्थानीय सैनिक कमांडर जनरल सुपियादीन ने कहा, "शांति की ज्योति जल रही है और इसे बुझने नहीं देना चाहिए."
इस मौक़े पर आचे की राजधानी बांदा आचे में सैकड़ों की संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे. सरकारी सैनिक तीन नौसैनिक जहाज़ और वायु सेना के दो परिवहन विमानों में वहाँ से रवाना हुए.
विद्रोही संगठन फ़्री आचे मूवमेंट ने पहले ही अपने हथियार डाल दिए हैं और संगठन ने अपनी हथियारबंद इकाई को भंग कर दिया है.
विद्रोही संगठन और सरकार के बीच हुए समझौते के तहत आचे प्रांत को और स्वायत्तता दी जा रही है. समझौते के तहत आचे में 14,700 से ज़्यादा सैनिक और 9100 से ज़्यादा पुलिसकर्मी नहीं तैनात रहेंगे और ये सभी स्थानीय ही होंगे.
समझौता
समझौते से पहले आचे में 35 हज़ार से ज़्यादा सैनिक और 15 हज़ार पुलिसकर्मी तैनात थे. समझौते के तहत विद्रोही संगठन फ़्री आचे मूवमेंट को स्थानीय राजनीतिक पार्टी बनाने की अनुमति दी जाएगी.
लेकिन इसके लिए देश के क़ानून में बदलाव की आवश्यकता पड़ेगी जिसे संसद को मंज़ूरी देनी होगी.
जकार्ता से बीबीसी संवाददाता राचेल हार्वी के मुताबिक़ ऐसा लगता है कि पिछले साल सूनामी की विनाशलीला के बाद ही सरकार और विद्रोहियों ने शांति की ओर क़दम बढ़ाया.
बीबीसी संवाददाता के अनुसार सूनामी के कारण हुई व्यापक तबाही और बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने के बाद न तो सरकार और न ही विद्रोही संगठन संघर्ष जारी रखने के पक्ष में थे.
फ़्री आचे मूवमेंट के प्रवक्ता बख़्तियार अब्दुल्ला ने कहा, "सूनामी के कारण दोनों पक्ष बातचीत के लिए सहमत हुए ताकि मानवीय सहायता आसानी से हो सके."
सूनामी के बाद आचे में 120 से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठन काम कर रहे हैं. सूनामी के बाद पहले कुछ महीनों तक जिन इलाक़ों में राहतकर्मियों को सुरक्षा कारणों से न जाने की सलाह दी गई थी, वे इलाक़े भी अब खुल रहे हैं.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सैनिकों की वापसी के बावजूद सरकार के सामने चुनौतियाँ बहुत हैं लेकिन इस प्रक्रिया का पहला चरण तो शांति से निपट गया है.