रविवार, 20 नवंबर, 2005 को 12:47 GMT तक के समाचार
आलोक प्रकाश पुतुल
छत्तीसगढ़
झारखंड के सैकड़ों जंगली हाथियों के छत्तीसगढ़ में घुस आने के बाद से राज्य के उत्तरी ज़िलों कोरबा, जशपुर, रायगढ़ और सरगुजा जिले में दहशत फैल गई है.
हज़ारों गाँवों के लोग रात-रात भर जाग कर अपनी जान-माल की सुरक्षा में लगे हुए हैं. घर और फसलों को नुक़सान पहुंचाने के साथ-साथ हाथियों ने लोगों को भी मारना शुरु कर दिया है.
हाथियों से डरे और वन विभाग की चुप्पी से गुस्साए जशपुर के सैकड़ों ग्रामीणों ने एक फ़ैसले के तहत इस साल दीवाली भी नहीं मनाई और अब वो सरकार से लड़ाई की मुद्रा में हैं.
दूसरी ओर हाथियों की बढ़ती संख्या ने राज्य सरकार को भी चिंता में डाल दिया है.
हाथी विशेषज्ञों की चेतावनी है कि आने वाले दिनों में हज़ारों की संख्या में झारखंड के जंगली हाथियों का दल छत्तीसगढ़ में घुस सकता है. ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ के कई शहरों पर इन हाथियों का ख़तरा मंडराने लगा है.
पुरानी समस्या
ऐसी बात नहीं है कि राज्य में पहली बार हाथियों ने उत्पात मचाया हो.
झारखंड और उड़ीसा के इलाके से हाथी पहले भी छत्तीसगढ़ में आते रहे हैं और जान-माल को नुकसान पहुंचाते रहे हैं लेकिन इन हाथियों की संख्या एक-दो दर्जन के आसपास होती थी और ये कुछ दिन उत्पात मचाने के बाद अपने पुराने इलाके में लौट जाते थे.
लेकिन झारखंड और उड़ीसा में वनों की कटाई के कारण छत्तीसगढ़ आने वाले हाथियों की संख्या हर वर्ष बढ़ती चली गई.
दूसरी ओर स्थाई रास्तों के प्रभावित होने से भी हाथियों को लगातार इधर-उधर भटकने के लिए बाध्य होना पड़ा.
झारखंड के जंगलों में अवैध कत्था बनाने वालों के कारण भी हाथियों के वापस जाने में मुश्किलें पैदा हुईं.
यही कारण है कि कुछ हाथियों ने राज्य के बादलखोल अभयारण्य को ही अपना स्थाई बसेरा बना लिया.
हाथियों की लगातार आवाजाही से परेशान छत्तीसगढ़ सरकार ने हाथियों को भगाने के लिए कई उपाय किए. लेकिन हाथियों का आतंक कम नहीं हुआ.
मुश्किलें
लंबे समय से हाथियों का आतंक का सामना कर रहे सरगुजा में ही पिछले तीन सालों में लगभग 50 लोग मारे गए हैं. कुछ समय पहले तो कुछ जंगली हाथियों ने ज़िला मुख्यालय अंबिकापुर के अति विशिष्ठ अतिथि गृह को ही अपना बसेरा बना लिया था.
पिछले कुछ समय में ही हाथियों ने सरगुजा के इलाके में सात लोगों को मार डाला है और सैकड़ों एकड़ में लगी धान की फसल को रौंद दिया है.
जशपुर इलाक़े का तो और भी बुरा हाल है. यह समय धान की फसल को काटने और उन्हें खेत-खलिहान से घर तक लाने का है.
ऐसे समय में हाथियों के हमलों ने कई ग्रामीणों की साल भर की कमाई चौपट कर दी है.
इलाके की हाथी भगाओ संघर्ष समिति ने सरकार के ख़िलाफ़ अब बड़े पैमाने पर आंदोलन करने का निर्णय लिया है.
समिति के अध्यक्ष शैलेश की मानें तो सरकार केवल मुआवज़ा बाँट कर अपना पल्ला झाड़ लेती है.
लेकिन राज्य के वन मंत्री ननकी राम कंवर हाथियों की समस्या के लिए केंद्र सरकार को ही ज़िम्मेवार ठहराते हैं.
कंवर के अनुसार राज्य सरकार ने एलिफेंट पार्क की योजना केंद्र को दी थी लेकिन केंद्र ने यह कह कर प्रस्ताव खारिज़ कर दिया कि छत्तीसगढ़ में केवल प्रवासी हाथी हैं.
ख़तरा
कंवर कहते हैं-“ हम इन हाथियों को अपने स्तर पर कुछ इलाकों में स्थाई तौर पर बसाने की योजना बना रहे हैं.”
लेकिन ऐसा लगता है कि कंवर आने वाले दिनों की मुसीबत को लेकर अनजान हैं.
झारखंड में पिछले 25 सालों से हाथियों पर शोध कर रहे डॉ डीएस श्रीवास्तव की मानें तो आने वाले दिन छत्तीसगढ़ के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं.
झारखंड के सिंहभूम ज़िले के के जंगलों में लगभग 2400 हाथी हैं और इन्हीं इलाकों में राज्य सरकार ने दर्जनों कंपनियों को खनन करने और फ़ैक्ट्री लगाने की अनुमति दी है.
डॉ श्रीवास्तव कहते हैं, “हाथियों के स्थाई आवास के साथ छेड़छाड़ झारखंड के टाटा और राँची जैसे बड़े शहरों के लिए तो ख़तरनाक होगा ही, हज़ारों हाथियों का छत्तीसगढ़ की ओर कूच करना वहां के बड़े शहरों के लिए भी मुश्किलें पैदा कर सकता है.”
वन मंत्री ननकी राम कंवर कहते हैं, “अभी तो हम इन सैकड़ों हाथियों से ही जूझ रहे हैं, जब और हाथी आएँगे तो उनका भी कोई न कोई हल निकालना ही पड़ेगा.”
लेकिन लगता है कि तब तक जनता हाथियों के आतंक के साए में जीती रहेगी.