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शनिवार, 05 नवंबर, 2005 को 05:55 GMT तक के समाचार

परमाणु समझौते की आलोचना

भारत और चीन के सुधरते संबंधों के बावजूद चीन की सरकार के अख़बार 'पीपुल्स डेली' ने जुलाई में भारत-अमरीका परमाणु समझौते की कड़े शब्दों में आलोचना की है.

अख़बार के अनुसार ये समझौता परमाणु अप्रसार के लिए बड़ा झटका है और इसके कई नुकसान हो सकते हैं.

अमरीका ने भारत से प्रतिबंध हटाए

ये भी कहा गया है कि यदि अमरीका परमाणु अप्रसार संधी का उल्लंघन करते हुए ऐसा कदम उठा सकता है तो दूसरी परमाणु शक्तियाँ भी अपने चहेते देशों के साथ ऐसे समझौते कर सकती हैं.

चाहे इस मामले पर ये चीन की औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं है लेकिन पर्यवेक्षक इसे चीन की नाराज़गी के तौर पर ही देख रहे हैं.

चीन से विरोध क्यों?

अंतरराष्ट्रीय मामलों और परमाणु मुद्दों के जानकार सी राजामोहन ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि भारत को ये समझना होगा कि चीन भारत के ख़िलाफ़ ऐसे कदम क्यों उठा रहा है.

भारत अमरीका के बीच अहम समझौता

उनका कहना था कि चीन का ऐसा कहना हास्यास्पद है क्योंकि चीन ने परमाणु अप्रसार के नियमों का उल्लंघन करते हुए पाकिस्तान को 1980 के दशक में परमाणु और मिसाइल तकनीक के मामलों पर सहयोग दे चुका है.

उनका कहना है कि चीन को लगता है कि जब अमरीकी सहायता इस मामले में भारत को मिलेगी तो भारत की शक्ति तीन गुना बढ़ेगी और क्या भारत के साथ मिलकर अमरीका चीन को रक्षा और रणनीति के क्षेत्रों में टक्कर देना चाहता है.

पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों के मामले में चीन ने जी-4 का विरोध किया चाहे उसने ये कहा कि चीन जापान के ख़िलाफ़ है भारत के नहीं.

अमरीका और परमाणु शक्तियाँ

अमरीकी कांग्रेस में भारत के लिए परमाणु नियमों में संशोधन पारित होने या न होने पर सी राजामोहन मानते हैं कि वहाँ इसका डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से जमकर विरोध हो रहा है क्योंकि वे परमाणु अप्रसार पर अड़े हुए हैं.

भारत से परमाणु सहयोग पर बहस

उनका कहना है कि बुश प्रशासन ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आश्वासन दिया है कि वे इसे कांग्रेस में पारित करवाएँगे और परमाणु शक्तियों के गुट में भी इसकी वकालत करेंगे.

लेकिन देखना ये है चीन परमाणु शक्तियों के गुट में क्या भारत का पूर्ण विरोध करता है या कुछ अन्य देशों से मिलकर दबाव बनाता है कि भारत के लिए ही क्यों रियायत की जाए, पाकिस्तान के लिए क्यों नहीं.

सी राजमोहन के अनुसार भारत के लिए यही बड़ी चुनौती है कि वह किस तरह से इस स्थिति का सामना करता है और क्या कदम उठाता है.