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शुक्रवार, 07 अक्तूबर, 2005 को 10:30 GMT तक के समाचार

बारादेईः एक सधे हुए अरब कूटनयिक

संयुक्त राष्ट्र की परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए और उसके प्रमुख मोहम्मद अल बारादेई को वर्ष 2005 का नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है.

डॉक्टर अल बारादेई मिस्र के कूटनयिक हैं और वह आईएईए में 1984 में आए थे, वह इस एजेंसी में 13 वर्षों तक महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बाद 1997 में इसके निदेशक बने.

हालाँकि अमरीका और आईएईए के रिश्ते मधुर नहीं कहे जा सकते, फिर भी अमरीका ने तीसरे कार्यकाल के लिए डॉक्टर बारादेई को समर्थन दे दिया.

बारादेई लंबे समय से कूटनयिक रहे हैं लेकिन उन्हें अपने विचार खुलकर व्यक्त करने के लिए जाना जाता है.

उन्होंने परमाणु शक्ति संपन्न देशों के दोहरे मानदंडों की आलोचना करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी है, मगर साथ ही वह इस बात के ख़िलाफ़ रहे हैं कि दुनिया के और देश परमाणु हथियार बनाएँ.

1942 में मिस्र में पैदा हुए अल बारादेई ने क़ाहिरा विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई की है. उन्होंने 1964 में मिस्र के विदेश मंत्रालय में काम करना शुरू किया था.

वह संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क और जिनेवा स्थित कार्यालयों में मिस्र के राजदूत रह चुके हैं.

डॉक्टर अल बारादेई न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय क़ानून में डॉक्टरेट कर चुके हैं. 1980 में वह संयुक्त राष्ट्र के इंस्टीट्यूट फॉर ट्रेनिंग ऐंड रिसर्च में क़ानून के कोर्स के निदेशक भी रहे.

वह जिस तरह पत्रकारों से सहजता से बात करते हैं लेकिन विवादास्पद टिप्पणियाँ नहीं करते, उससे साफ़ पता चलता है कि वे एक सधे हुए कूटनयिक हैं.

ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के मामले में उन्होंने बहुत ही संयत रुख़ अपनाया है और मामले को कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने की पूरी कोशिश की है.

विवाद

आईएईए के निदेशक के रूप में इराक़ के मामले पर उनके विचारों की वजह से अमरीकी प्रशासन के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं.

ईरान के मामले में भी उनका रुख़ ऐसा नहीं है जो अमरीका को रास आए.

लेकिन परमाणु अप्रसार के मामले पर राष्ट्रपति बुश और अल बारादेई एक दूसरे से सहमत दिखते हैं, दोनों चाहते हैं कि परमाणु हथियारों का प्रसार पूरी तरह रुक जाए और इसके लिए परमाणु अप्रसार संधि पर दोनों ज़ोर देते हैं.

अल बारादेई इस बात को लेकर काफ़ी चिंतित रहे हैं कि परमाणु ऊर्जा के नाम पर हथियार बनाने की कोशिश न हो, लेकिन इस मामले में उन्होंने ख़ास ध्यान रखा है कि उन्हें अमरीका के सहयोगी या समर्थक के रूप में न देखा जाए.