शनिवार, 24 सितंबर, 2005 को 16:19 GMT तक के समाचार
परमाणु मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने एक प्रस्ताव पारित कर ईरान के परमाणु कार्यक्रम के मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाने का फ़ैसला किया है.
लेकिन अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के इस प्रस्ताव में कोई समयसीमा तय नहीं की गई है.
प्रस्ताव का विरोधी समझे जानेवाले भारत ने मतदान में प्रस्ताव का समर्थन किया है.
अमरीका ईरान पर आरोप लगाता है कि वह परमाणु हथियारों का विकास कर रहा है.
लेकिन ईरान कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य केवल ऊर्जा हासिल करना है.
ईरान ये चेतावनी दे चुका है कि अगर उसके मामले को सुरक्षा परिषद ले जाया गया तो वह यूरेनियम संवर्द्धन शुरू कर देगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों को अपने कार्यक्रमों का निरीक्षण नहीं करने देगा.
प्रस्ताव
ईरान के बारे में प्रस्ताव यूरोप के तीन देशों, ब्रिटेन,फ़्रांस और जर्मनी ने पेश किया था.
प्रस्ताव पर वियना में 35 सदस्यों वाले बोर्ड के बीच शनिवार को मतदान हुआ.
22 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में जबकि केवल एक ने विपक्ष में मत डाला.
12 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. प्रस्ताव का विरोध करनेवाला एकमात्र देश वेनेज़ुएला रहा.
भारत को इस प्रस्ताव का विरोधी माना जा रहा था लेकिन भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला.
रूस और चीन ने भी इस प्रस्ताव का जमकर विरोध किया था लेकिन दोनों ही देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.
ये प्रस्ताव तीन यूरोपीय देशों, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी, ने पेश किया था.
तीनों देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में उससे बातचीत कर रहे थे.
संवाददाताओं के अनुसार प्रस्ताव का पारित होना पश्चिमी देशों के लिए एक बड़ी जीत है जो ईरान पर लगातार उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए दबाव डाल रहे हैं.
भारत
भारत ने ईरान पर यूरोपीय देशों के प्रस्ताव का विरोध किया था लेकिन जब प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो उसने इसके पक्ष में मत डाला.
इससे पहले भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर ये कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ईरान से आग्रह किया था कि वह अपना रूख़ लचीला रखे.
मनमोहन सिंह ने टेलीफ़ोन पर ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद से बात की और उनसे कहा कि इस मामले पर बात अटकने की सूरत में उन्हें रियायत के लिए तैयार रहना चाहिए.
मनमोहन सिंह ने ईरानी राष्ट्रपति से कहा कि इस विवाद का निपटारा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के माध्यम से ही किया जाना चाहिए.
संवाददाताओं के अनुसार अमरीकी अधिकारियों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भारत के ढुलमुल रवैये की बार-बार आलोचना की थी.
अमरीका ने ऐसी चेतावनी भी दी थी कि अगर भारत ने अमरीका और यूरोप का साथ नहीं दिया तो वह जुलाई में हुए समझौते को रोक सकता है.
इस समझौते के तहत अमरीका ने भारत को नागरिक ज़रूरतों के लिए परमाणु तकनीक दिए जाने पर लगी रोक हटा दी थी.