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सोमवार, 19 सितंबर, 2005 को 04:35 GMT तक के समाचार

राजेश जोशी
न्यूयॉर्क से बीबीसी संवाददाता

हिंदी बोल सकते हैं शशि थरूर

शशि थरूर को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि जिस नेता का वो परिचय करवा रहे हैं उसने तख़्ता पलट करके सत्ता पर क़ब्ज़ा किया या फिर उसे जनतांत्रिक तरीक़े से चुना गया.

संयुक्त राष्ट्र में उप महासचिव होने के कारण शशि थरूर का एक काम दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों का परिचय अख़बार और मीडिया से करवाना भी है. लेकिन ये काम वो पूरी निरपेक्षता के साथ करते हैं.

पत्रकारों से पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ का परिचय कराते समय उन्हें शशि ने एक क़ाबिल फ़ौजी बताया तो ईरान के नए राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की नेतृत्व क्षमता की उन्होंने ठोस तारीफ़ की.

संयुक्त राष्ट्र में हर सदस्य देश बराबर है और उसके साथ बराबरी का ही व्यवहार किया जाना चाहिए.

मुहावरे की भाषा में कहें तो विश्व शिखर सम्मेलन के दौरान उन्हें साँस लेने की भी फ़ुरसत नहीं थी, फिर भी उन्होंने मुझसे बात करने के लिए समय निकाला.

हिंदी

लेकिन जब मैंने उनसे हिंदी में इंटरव्यू की बात कही तो शशि ने लगभग हाथ खड़े कर दिए.

बहरहाल, कुछ दिल्ली का हवाला तो कुछ कोलकाता का वास्ता देकर मैंने उन्हें हिंदी में बात करने को राज़ी कर ही लिया.

पर बार बार सही शब्द ढूँढने की कोशिश और फिर असफल होने की खीझ शशि थरूर के चेहरे पर साफ़ पढ़ी जा सकती थी.

उन्होंने सिर को हलका सा झटका देकर एक ज़ोरदार चुटकी बजाई, मुस्कुराए और कहा "उन्नीस पैंतालीस" में जब संयुक्त राष्ट्र बना था तब स्थितियाँ अलग थीं. वो नाइन्टीन फोर्टी फ़ाइव का हिंदी अनुवाद करना चाह रहे थे.

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में शायद मैं पहला पत्रकार था जिसने उनसे हिंदी में इंटरव्यू देने की गुज़ारिश की और उन्हें इसके लिए राज़ी कर ही लिया.

हिंदी शशि की भाषा नहीं है, लेकिन उन्होंने कोलकाता और दिल्ली में पढ़ाई की है इसलिए हिंदी समझते हैं.

वे पूरी ईमानदारी से कहते हैं,"मेरी हिंदी बहुत ख़राब है. गपशप करते वक़्त तो मैं हिंदी में बात कर सकता हूँ, लेकिन गंभीर मुद्दों पर अँगरेज़ी में ही बात करना आसान होता है."

भारतीयता

शशि थरूर उन भारतीयों में से हैं जिन्होंने भारत से बाहर रहने के बावजूद अपनी भारतीय पहचान बनाए रखी है और पासपोर्ट भी नहीं बदला.

भारतीय जनजीवन से जुड़े कई उपन्यास और विश्लेषणात्मक किताबें लिखकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा चुके शशि थरूर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तीन साल की उम्र में ही किताबें पढ़नी शुरू कर दी थीं.

उनकी पहली किताब जब प्रकाशित हुई तो वो सिर्फ़ दस साल के थे.

वो ऐसे दौर में संयुक्त राष्ट्र का बचाव करने की ज़िम्मेदारी सँभाले हुए हैं जब चारों ओर उसे नाकारा और निस्तेज क़रार दिया जा रहा है.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन के दौरान साफ़ कहा कि ये संस्था 1945 के यथार्थ में ही फँसी हुई है. इसे आज यानी 2005 की सचाइयों के अनुरूप ढाला जाना चाहिए.

उन्होंने माना कि संयुक्त राष्ट्र की ये आलोचना कुछ हद तक सही है, इसीलिए इसमें सुधार लाने और पुराने ढर्रे को बदलने की कोशिशें की जा रही हैं.

उनके कमरे के बाहर ईरानी कूटनयिकों का एक प्रतिनिधिमंडल इंतज़ार कर रहा था और इंटरव्यू लंबा चलने की कोई गुंजाइश नहीं थी.

लेकिन मुझे ख़ुशी इस बात की थी कि अब शशि थरूर का ये बहाना बेअसर हो गया था कि हिंदी उन्हें नहीं आती.

मेरे पास अब उनकी आवाज़ में ही इस बात का सबूत था.