रविवार, 28 अगस्त, 2005 को 13:34 GMT तक के समाचार
इराक़ के राष्ट्रपति जलाल तलाबानी ने कहा है कि देश के नए संविधान का मसौदा अब सभी इराक़ियों की ज़िम्मेदारी है.
राष्ट्रपति ने कहा कि वे मानते हैं कि यह दस्तावेज़ 'सम्पूर्ण' नहीं है. लेकिन उन्होंने इराक़ी जनता से अपील की कि वे संविधान पर 15 अक्तूबर को होने वाले जनमतसंग्रह में इसे अपना समर्थन देंगे.
कई दिनों तक चले विचार-विमर्श के बाद रविवार को नए संविधान के मसौदे को संसद के सामने पेश किया गया. मसौदा तैयार करने वाली समिति के शिया और कुर्द सदस्यों ने बहुमत से इसे मंज़ूरी दी.
लेकिन सुन्नी सदस्यों ने इसे ठुकरा दिया. सुन्नी सदस्यों ने एक बयान जारी करके संयुक्त राष्ट्र और अरब लीग से अपील भी की कि वे इस मामले में दख़ल दें.
सुन्नी सदस्यों को अभी भी संघीय व्यवस्था, संसाधनों के बँटवारे, इस्लाम की भूमिका और पूर्व बाथ पार्टी सदस्यों को सरकारी पद न देने जैसे मुद्दों पर आपत्ति है.
सुन्नी नेता अब्दुल नासिर अल जनाबी ने सुन्नी सदस्यों की ओर से जारी बयान पढ़कर सुनाया. बयान में कहा गया है, "हम संविधान के मसौदे को ख़ारिज करते हैं. हम इससे सहमत नहीं. मसौदे में जो लिखा गया है, वह हमें स्वीकार नहीं. हम इस पर एक राय नहीं बना सके. इस कारण इस मसौदे का कोई मतलब नहीं."
हालाँकि सुन्नी नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे देश की राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा लेंगे. उन्होंने घोषणा की कि वे दिसंबर में होने वाले चुनाव में भी हिस्सा लेंगे.
मंज़ूरी
नए संविधान को आख़िरी मंज़ूरी अक्तूबर में होने वाले जनमतसंग्रह से ही मिलेगी और बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि सुन्नी समुदाय के विरोध की स्थिति में ऐसा होना मुश्किल लगता है.
इराक़ के राष्ट्रपति जलाल तलाबानी ने इराक़ियों से अपील की है कि वे इस मसौदे का समर्थन करें. उन्होंने कहा कि वे आशावादी हैं और उन्हें उम्मीद है कि सभी इराक़ी इसे स्वीकार कर लेंगे.
कई बार मसौदे पर सहमति के लिए समयसीमा बढ़ी लेकिन आख़िर में जो मसौदा संसद के सामने रखा गया है उसे सुन्नी समुदाय की सहमति हासिल नहीं है.
इराक़ी संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति ने बहुमत से इसे मंज़ूर तो कर लिया था. लेकिन मसौदे में किए गए कुछ संशोधनों के बावजूद सुन्नी सदस्य इससे सहमत नहीं थे.
अमरीका ने भी सर्वसम्मति से मसौदा पास होने के लिए अपनी ओर से बहुत कोशिश की थी लेकिन सफलता नहीं मिली.
विवाद के केंद्र में अभी भी वही बातें हैं, जिन पर सुन्नी समुदाय शुरू से ही अपनी आपत्ति व्यक्त करता रहा है. मसलन संघीय व्यवस्था, संसाधनों का बँटवारा, पूर्व बाथ पार्टी सदस्यों को सरकारी पद न देना और इस्लाम की भूमिका.