सोमवार, 01 अगस्त, 2005 को 09:07 GMT तक के समाचार
सऊदी अरब के शाह फ़हद की मौत एक ऐसे अध्याय का अंत है जिसमें सऊदी अरब ने कई उतार-चढ़ाव झेले.
सुधारवादी आंदोलन के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ बनते-बिगड़ते संबंधों ने देश की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
शाह फ़हद के शासनकाल में सऊदी अरब ने अमरीका और ब्रिटेन दोनों से नज़दीकी संबंध बनाने में सफलता पाई.
दूसरी ओर उन्हें देश के भीतर तेल से होने वाली आय में कमी देखनी पड़ी तो समाज में लगातार आ रही दरार से भी दो चार होना पड़ा.
शाह फ़हद का जन्म 1922 में हुआ था. वे सऊदी अरब के संस्थापक शाह अब्दुल अज़ीज़ के सात बेटों में से एक थे. उनकी माँ हस्सा शाह अब्दुल अज़ीज़ को बेहद प्रिय थीं.
1982 में शाह फ़हद ने सत्ता संभाली. वे सत्ता संभालने वाले चौथे बेटे थे. इससे पहले दो बेटों को सत्ता से हटाया गया था. एक का तख़्तापलट दिया गया था और दूसरे की हत्या कर दी गई थी.
अनुभवी राजनीतिज्ञ
युवावस्था में उनकी छवि एक खिलंदड़े युवक की थी और उन पर महिलाओं के साथ संबंधों, शराबखोरी और जुआ खेलने में मस्त रहने के आरोप थे.
कहा जाता है कि मोन्टे कार्लो जुआघर में वे एक ही रात साठ लाख डॉलर हार गए थे.
लेकिन 1950 के दशक में उनकी जीवन शैली बदली जब वे सऊदी अरब के मंत्रिमंडल में शामिल किए गए.
शिक्षा मंत्री के रुप में वे एक उदारवादी मंत्री साबित हुए जिसने महिलाओं की शिक्षा के मसले को आगे बढ़ाया.
युवा शाह फ़हद को एक टेक्नोक्रैट और चतुर चालाक राजनीतिज्ञ के रुप में जाना जाता था जो अंदरूनी सुरक्षा के बारे में जानते थे और यह भी जानते थे कि राजशाही को किस तरह सुरक्षित रखा जाए.
उन्हें एक कुशल राजनयिक के रुप में भी जाना जाता था जो देश की विदेश नीति को भली भांति समझते थे, ख़ासकर अमरीका से सऊदी अरब के रिश्तों के रुप में.
जब उन्होंने शाह की ज़िम्मेदारी संभाली तब तक वे एक अनुभवी राजनीतिज्ञ बन चुके थे.
अकूत संपदा
शाह फ़हद की यह राजनीतिक कुशलता उस समय महत्वपूर्ण साबित हुई जब 1970 में तेल की क़ीमतो में हुई बढ़ोत्तरी का युग धीरे-धीरे समाप्त होने लगा.
उस समय तो सऊदी अरब में आय को लेकर तरह-तरह के क़िस्से सुनाए जाते थे और कहा जाता है कि ख़ुद शाह फ़हद ने उस समय 18 अरब डॉलर की परिसंपत्तियाँ अर्जित कीं.
लेकिन तरक्क़ी का यह ऊफ़ान बहुत समय तक क़ायम नहीं रह सका और 1980 के दशक में तेल की क़ीमतें फिर गिरने लगीं और सऊदी अरब की आय में कमी होने लगी.
उस समय अल फ़हद को सरकारी ख़र्चों में कटौतियाँ करनी पड़ीं और उनकी सत्ता को बाहर से चुनौती भी मिलने लगी.
दुश्मन
1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि इसका प्रसार सऊदी अरब में भी हो सकता है.
एक ओर तो जब ईरान और इराक़ के बीच युद्ध हुआ तो सऊदी अरब ने इराक़ को भारी-भरकम सहायता मुहैया करवाई.
दूसरी ओर उन्होंने अपनी इस्लामिक वैधानिकता को भी पुख़्ता करने की कोशिश की. 1986 में उन्होंने अपने आपको ख़ादिम अल-हरमाइन अल-शरफ़ाइन यानी दो पवित्र मस्जिदों के संरक्षक की पदवी से नवाज़ लिया था.
इससे वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि मक्का और मदीना की मस्जिदों के संरक्षक हैं. लेकिन चुनौती इससे कहीं ज़्यादा बड़ी थी.
1990 में इराक़ ने पड़ोसी कुवैत पर हमला कर दिया और शाह फ़हद ने एक संवेदनशील निर्णय लेते हुए सऊदी तेल भंडारों की सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों से सुरक्षा माँगने का निर्णय लिया.
उन्होंने अपने लोगों को बताया कि ये फ़ौजें संयुक्त अभ्यास के लिए आ रही हैं और इन फ़ौजों की उपस्थिति अस्थायी ही रहेगी.
लेकिन युद्ध के बाद भी ये फ़ौजें बनी रहीं बावजूद इसके कि देश के भीतर इसका कड़ा विरोध हो रहा था.
लोगों को लगता था कि जहाँ इस्लाम का जन्म हुआ वहाँ किसी ग़ैर मुस्लिम सैनिकों की उपस्थिति ग़लत है और यह पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की शिक्षा के ख़िलाफ़ है.
यह मामला तब और गहरा गया जब 11 सितबंर 2001 को अमरीका में हमले हुए और विमानों का अपहरण करने वालों में से 15 के बारे में कहा गया कि वे सऊदी अरब के नागरिक थे.
ओसामा बिन लादेन ने हमेशा से कहा था कि विदेशी सैनिकों को खदेड़ा जाना चाहिए. इसके अलावा समय समय पर शाही परिवार के विरोध के स्वर भी सुनाई देते रहे हैं.
खाड़ी युद्ध ने शाह फ़हद को कई कड़े कदम उठाने पर भी मजबूर किया. इस तरह से देखें तो शाह फ़हद राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य, सभी चुनौतियाँ झेल रहे थे.
अनुभवी उत्तराधिकारी
शाह फ़हद का स्वास्थ्य लंबे समय से एक समस्या थी. वे लगातार धूम्रपान करते थे, लंबे समय से उन्हें डायबिटीज़ थी और उन्हें 1995 में दिल का एक दौरा भी पड़ा था.
थोड़े समय के अवकाश के बाद उन्होंने व्हील चेयर और छड़ी के सहारे उन्होंने फिर सारी ज़िम्मेदारी संभाल ली थी.
उन्होंने अब्दुल्ला को अपना उत्तराधिकारी चुना जो उनके सौतेले भाई हैं. अब्दुल्ला नेशनल आर्मी और ट्राइबल आर्मी के प्रमुख हैं जो शाही परिवार की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभालती है.
भावी शाह, अब्दुल्ला के बारे में कहा जाता है कि भ्रष्टाचार के मामले में वे बेदाग़ हैं लेकिन अमरीका के प्रति उनका आकर्षण शाह फ़हद की तुलना में कम है.
अब्दुल्ला पिछले पाँच सालों से परोक्ष रुप से सऊदी अरब के शासक रहे हैं.