हॉलैंड की अदालत ने देश के जाने माने निर्देशक थियो वैन गॉग की हत्या के आरोप में मोहम्मद बुयेरी नाम के एक व्यक्ति को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है.
मोरोक्को मूल का मोहम्मद बुयेरी उत्तरी अफ़्रीका के देश मोरोक्को और हॉलैंड दोनों ही देशों का नागरिक था.
अदालत में अपने मामले की सुनवाई के दौरान बुयेरी ने माना है कि उसने वैन गॉग की हत्या इसीलिए की क्योंकि उन्होंने इस्लाम और महिलाओं पर एक फ़िल्म बनाई थी जो उसकी नज़र में आपत्तिजनक थी.
हॉलैंड में मोहम्मद बुयेरी के मामले को बेहद गंभीर माना जा रहा है क्योंकि बुयेरी लंबे समय से हॉलैंड में रह रहा था.
बीबीसी संवाददाता जॉन लेन का कहना है कि पिछले साल नवंबर में जब ये मामला उठा था तभी से इस बात पर चिंता व्यक्त की जा रही थी कि पश्चिमी देशों में बस चुके मुसलमानों के बीच अगर अतिवादी मानसिकता पनपने लगी तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
इस मामले से ज़्यादा चिंता इसीलिए बढ़ी थी क्योंकि हॉलैंड को दुनिया के सबसे उदारवादी राष्ट्रों में से एक माना जाता है.
शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत में अपना पक्ष रखते हुए हॉलैंड के सरकारी वक़ील ने कहा, “हम अपनी मासूमियत खो बैठे हैं.”
इस हत्या में बुयेरी का हाथ होने की ख़बरों के बाद हॉलैंड में कुछ मस्जिदों और कुछ मुसलमानों पर भी हमले हुए. लेकिन फिर उसके बाद शुरू हुई एक नई बहस.
नए उपाय
हॉलैंड की लगभग डेढ़ करोड़ की जनसंख्या में से 10 लाख मुसलमान हैं. क्या हॉलैंड का समाज मुसलमानों के साथ अच्छे संबंध बना पाया है?
फ़िल्मकार थियोडोर वैन गॉग के साथ उनकी फ़िल्म में काम कर चुके अयान हिरसी अली कहते हैं कि हॉलैंड के राजनीतिज्ञ मुसलमानों की आकांक्षाओं और चिंताओं को नहीं समझ पाए हैं
हिरसी कहती हैं "हमने सामाजिक सांस्कृतिक मसलों को नज़रअंदाज़ किया. यही कारण है कि अल्पसंख्यक मुसलमान मध्यपूर्व से होनेवाले प्रचार का निशाना बन बैठे. ये प्रचार इंटरनेट से हो रहा है, सैटेलाइट डिश यानि टीवी के ज़रिए भी हो रहा है.”
एक दूसरे स्तर पर हॉलैंड की सरकार ने इस बात पर नज़र रखना शुरू कर दिया है कि मस्जिदों में क्या पढ़ाया जा रहा है.
विदेशों से नीदरलैंड्स आने वाले इमामों की तादाद कम रखने की कोशिश की जा रही है और नीदरलैंड्स के इमामों को डच भाषा बोलने और उदारवादी विचारधारा पर ज़ोर देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.
डच विश्वविद्यालयों में इस्लाम की पढ़ाई के लिए नए कोर्स शुरू किए जा रहे हैं.
इनमें से कुछ विश्वविद्यालयों के प्रोटेस्टैंट चर्च से भी करीबी संबंध हैं.
कुछ इस्लामी संगठन इन बातों से काफ़ी नाराज़ हैं. उनका कहना है कि नए इमाम तैयार करने और लोगों का नज़रिया बदलने के काम में लंबा समय लग सकता है.
लंदन बम हमलों के बाद कुछ इसी तरह का विवाद यहाँ ब्रिटेन में भी शुरू हो रहा है, जहाँ कहा जा रहा है कि बम हमले करने वालों में ऐसे लोग हैं जो लंबे समय से ब्रिटेन में ही रह रहे थे.