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मंगलवार, 12 जुलाई, 2005 को 15:47 GMT तक के समाचार

ममता गुप्ता और महबूब ख़ान
लंदन

मंगल ग्रह लाल क्यों है?

बीबीसी हिंदी के श्रोताओं और पाठकों की बहुत सी जिज्ञासाएँ ऐसी हैं जिनके बारे में वे हमसे सवाल करते हैं. ममता गुप्ता नियमित रूप से ऐसे ही कुछ सवालों का जवाब देती हैं...

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प्रश्न: गाँव रानी, बेगुसराय, बिहार से कुमारी प्रीति जानना चाहती हैं कि मंगल ग्रह लाल क्यों दिखता है?

उत्तर: मंगल ग्रह लाल इसलिए दिखता है क्योंकि उसके वायुमंडल में ज़ंग लगे लोहे के कण बिखरे हुए हैं. मंगल की ज़मीन भी लाल है.

प्रश्न: अरारी, गिरिडीह बिहार के परमेश्वर प्रसाद पूछते हैं दक्षिण भारत में कौन सा स्थान आतिशबाज़ी तैयार करने के लिए प्रसिद्ध है?

उत्तर: सिवाकासी. ये तमिल नाडु के विरुदनगर ज़िले में है. यहाँ पटाख़े ही नहीं बल्कि दियासलाई और छपाई के कारख़ाने भी हैं. बीसवीं शताब्दी के शुरु में नाडार भाइयों ने इन उद्योगों की स्थापना की थी. कहते हैं कि सिवाकासी के इस औद्योगीकरण के चलते पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे मिनी जापान का नाम दिया था.

इस उद्योग में हर साल, सात अरब रुपए का व्यापार होता है और इसमें कोई एक लाख लोग काम करते हैं. भारत से पटाख़ों का निर्यात बहुत कम होता है. कुल व्यापार का चार या पाँच प्रतिशत. और इसका प्रमुख कारण ये है कि भारत की पोत परिवहन सुविधाएं सीमित हैं. फिर कोलम्बो, सिंगापुर, दुबई जैसे बंदरगाह आतिशबाज़ी से लदे जहाज़ को अपने क्षेत्र से होकर भी नहीं जाने देते.

प्रश्न: ग्राम सलामपुर गांगी, किशनगंज बिहार से मोहम्मद ज़ुबैर आलम ये जानना चाहते हैं कि समुद्र में खनिज तेल का पता कैसे लगाया जाता है?

उत्तर: इसके लिए पहले सैटेलाइट से सर्वेक्षण करके गुरुत्व चुम्बकीय आँकड़े जुटाए जाते हैं. इन आंकड़ों के आधार पर जिस क्षेत्र का पता चलता है वहाँ विशेष तरह के जहाज़ भेजे जाते हैं जो गुरुत्व, चुंबकीय और भूकम्पीय जानकारी एकत्र करते हैं. उसके बाद प्राप्त आँकड़ों का अध्ययन किया जाता है और फिर ड्रिलिंग का काम शुरु होता है. तभी पता चलता है कि वहाँ तेल है या नहीं.

ये तेल लाखों करोड़ों साल पहले सागरों और उनके आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले जीव जंतुओं और वनस्पतियों के अवशेषों से बना है. जब ये नष्ट हुए तो धीरे धीरे इनपर रेत और मिट्टी की परतें चढ़ती चली गईं, जिन्होने बाद में चट्टानों का रूप धारण कर लिया. जीवों और वनस्पतियों के अवशेष कालांतर में गहरे द्रव में बदल कर चट्टानों के बीच जहाँ जगह मिली वहाँ क़ैद हो गए. इसी द्रव को कच्चा तेल कहा जाता है.